Sunday, May 27, 2012


ख़ामोशी छोड़ कर चले गए जो हैं , लम्हे ,
बज़्म में वो लौट कर अब नहीं आने वाले !!


तुम्हारी नादानियों से टूट गए जो खिलौने,
इन कमजोर कोशिशों से नहीं जुड़ने वाले !!


दिल से मिट चुके हसीं यादों के जो मंजर,
इन पनीली आँखों से कभी नहीं जाने वाले !!


सोचा तुम्हे पुकार लें करीब जाकर, लेकिन ,
हलक में घुटे लफ्ज़ जबां पे नहीं आने वाले!!


वफ़ा की आस में हमें रुसवाई मिलती रही
दिल में लगे दाग अब यूँ नहीं मिटने वाले !!


इस तंगदिली को हम क्या नाम दें ' ऐ तल्ख़'
ज़फाबाजी के इलज़ाम भी हैं अब लगने वाले !!

खानाबदोशों की महफ़िल है ये दुनिया तमाम
फिर से ये मजमे तमाशे हैं यहाँ सजने वाले !!
 



हर रोज़ नारी को अपमान का घूंट पीना पड़ता है....
एक स्त्री होने का कहर सहना पड़ता है..
कभी बेटी के रूप में...
जिम्मेदार बन खुदके अरमानों का गला घोटा है....
तो माँ के रूप में खुद को ही भुला बैठती है....
हर मोड़ पर एक ऑरत होना ही उसके सपनो का ही दुश्मन बना है....
जिम्मदारी का लिहाफ ओढ़े जब बेटी दूसरे जाती है...
तो उसे वो स्वर्ग बनती है...
मगर हर पल उसका दिल अपने पन को तरसता है....
बस कहने को ही बहु और बेटी एक सामान है....
जब वो पंख फैला अपने सपनों को पूरा करना चाहती है....
तो उसके पंख क़तर दिया जाते हैं...
आज सारा समाज यही कहता है....
लड़का लड़की में आज फर्क कहाँ हैं....
लेकिन हकीकत को जानता हर इंसान है....
हर कदम पे रिश्ते, नाते, रस्मों कि जंजीरों में हमें ही जकड़ा जाता है...
परिवार की शान के नाम पे हमारा ही गला घोटा जाता है...
कभी दहेज़ तो कभी नफरतों कि आग में कई बार झुलसाई गयी हैं...
हमने जब अपना नाम आसमान में लिख दिया है
फिर क्यों हम .. हर मोड़ पर सताई गयी हैं....

हर कदम पे हमें मजबूर किया हैं...
हमारे पैरो को जकड़ दिया है....
जब हमारे कदम बढे भी हैं तो....
उनके हौसलों को वहीं पस्त किया गया है....
हमारा जब कोई वजूद ही नहीं था तो फिर क्यों ?
हर पल दधकती आग में जलने को पैदा किया....
क्यों आखिर क्यों हमें पैदा किया????



एक दीप सूरज के आगे
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लीक से हटकर अलग
चाहे हुआ अपराध मुझसे,
सच कहूँ, सूरज के आगे
दीप मैंने रख दिया है !

प्रश्नों के उत्तर नये देकर
उलझना जानता हूँ ,
और हर उत्तर में जलते
प्रश्न को पहचानता हूँ !
जाने क्यों संसार मेरे
प्रश्न पर कुछ मौन सा है ,
तोड़ने इस मौन का हर स्वाद
मैंने चख लिया है !

इंद्रधनुषी स्वप्न का बिखराव
मैंने खूब देखा,
रात का रुठा हुआ बर्ताव
मैंने खूब देखा !
पर सुबह की चाह मैंने
ताक पर रखना न जाना,
हर चुनौती को सफल जीवन का
स्वीकृत सच लिया है !

धूल से उठकर लकीरें
याद के जंगल में भटकीं,
और गले में चीख के वे
दर्द के मानिंद अटकीं !
पर मुझे जो आईना था
हर घड़ी निज – पथ सुझाता,
बस उसी के नाम यादों का
झरोखा कर दिया है !

स्वप्न मृत होते नहीं
यदि दीप हरदम दिपदिपायें,
धीरे – धीरे ही सही
जलती वो बाती मुस्कराये !
कोई माने या न माने
मान दे या तुच्छ बोले
जी सकूँ हर अंधेरे में
मैंने ऐसा हठ किया है !

सच कहूँ, सूरज के आगे
दीप मैंने रख दिया है !



धडकते दिल में रहे आप धडकनों की तरह.
जमे ज़हन में मिले रोज़ उलझनों की तरह.


फ़क़त जो सच था न कहने से वो गुरेज़ किया,
शहर तमाम मिला क्यूँ है दुश्मनों की तरह.


रखा ख़याल न एक ज़र्ब भी पड़े तुम पर,
तुम्ही ने समझा हमें क्यूँ है अडचनों की तरह.


सभी ने चौंक के हाथों में ले लिए पत्थर
न रहना चाहिए हमको था दर्पणों की तरह.


सुकूनो चैन तो सारा वो ले गया है लूट,
कि हमसफर भी मिला है तो रहज़नों की तरह.


जियादा देर तेरे संग चल न पायेंगे,
सहेज लेना हमें आखिरी क्षणों की तरह.
अलविदा ……




Saturday, May 19, 2012

मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!
कभी बन कर
कोल्हू के बैल
घूमते रहे गोल-गोल
ख्वाबों में रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
होते रहे चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
कभी सूरज ने
झुलसाया तन-मन
जला डाला निवाला
लू के थपेड़ों में चपेट
भूख-प्यास ने मार डाला
समझ न पाए
क्यों जमाना
इतना क्रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
कभी कहर बना आसमाँ
बहा ले गया वजूद सारा
डूबते-उतराते निकला दम
पाया नहीं कोई किनारा
निरीह, वेबस आँखों में
उमड़ती रही बाढ़
फिर भी पेट की आग
बुझाने से रहे बहुत दूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
कभी कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
पल भर में मिटा गया हस्ती!
तिनका तिनका पैरों तले रौंदा
सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
रचना--…कविता रावत




Tuesday, May 15, 2012


ये दुनिया है कैसी,जिसमे कोई नही सुनता !
सब को अपनी-अपनी, नही किसी की चिन्ता है!!
हर तरह के लोग यहा, कई रंग बदलते है!
जिसकी जैसी ईच्छा ,वो वैसे ही करते है!!
मतलब के लिए ये लोग ईमान , बदलते है!
पैसो के लि यहा लोग ,आपस मे लड़ते है!!
कई लोग तड़प कर के बिन भुख से मरते है!
पर बहु लोग खाते -खाते ही मरते है!!
कई बच्चे भी ऐसे ,जिन्हे दूध नही मिलता!
इसिलिए ही ये जीवन उन्हे ,उनका नही मिलता!!
कई पढ़े -लिखे नौ -जवा,जिन्हे काम नही मिलता!
अपने करतब का उन्हे ईनाम नही मिलता!!
दौलत के लिए यहा लोग ईज्जत को बेचते है!
अपने खुशियो का पौधा, खुन से सिचते है!!
ये घुटन भरी दुनिया,जिसमे रहा नही जाता!
हालत को देख-देख करके, कुछ कहा नही जाता!!



Monday, May 14, 2012

कालचक्र में फँसी पृथ्वी
तब भी रहेगी वैसी की वैसी
अपने ध्रुवों और अक्षांशों पर
वैसी ही अवसन्न और आक्रान्त!

धूसर गलियाँ
अहिंसा सिखाते हत्यारे
असीम कमीनेपन के साथ मुस्कराते
निर्लज्ज भद्रजन,
असमय की धूप और अंधड़…
कुछ भी नहीं बदलेगा!
किसी चमत्कार की तरह नहीं आएंगे देवदूत
अकस्मात हम नहीं पहुँच सकेंगे
किसी स्वर्णिम भविष्य में
सत्ताधीशों के लाख आश्वासनों के बावजूद!

पृथ्वी रहेगी वैसी की वैसी!

रहेंगी –
पतियों से तंग आती स्त्रियाँ
फतवे मूर्खता और गणिकाएँ
बनी रहेंगी बाढ़ और अकाल की समस्याएँ
मठाधीशों की गर्वोक्तियाँ
और कभी पूरी न हो सकने वाली उम्मीदें
शिकायतें… सन्ताप…

बचे रहेंगे –
चीकट भक्ति से भयातुर देवता
सांस्कृतिक चिन्ताओं से त्रस्त
भाण्ड और मसखरे
उदरशूल से हाहाकार करते कर्मचारी!
रह जाएगा –
ज़िन्दगी से बाहर कर दी गईं
बूढ़ी औरतों का दारुण विलाप
एक-दूसरे पर लिखी गईं व्यंग्य-वार्ताओं का टुच्चापन
और विलम्वित रेलगाड़ियों का
अवसाद भरा कोरस…

तिथियों के बदलने से नहीं बदलेंगी आदतें
चेहरे बदलेंगे… रंग-रोग़न बदल जाएगा

सोचो लोगो!
ये इक्कीसवीं सदी की सुबह है
क्या तुम ठीक-ठीक कह सकते हो
कि हम किस सदी में जी रहे हैं?

Sunday, May 6, 2012

ज़फ़ा की ही अदा तुम हुस्न वालों को क्यों आती है ;
किसी का दिल बहलता है , किसी की जान जाती है .

उतरता हूँ मैं अपनी छत से जितना मिलने को तुझसे ;
अकड़ गर्दन की तेरी उतनी ही क्यों बढ़ती जाती है .

तू है आईना , तुझमे अक्स मिटते बनते रहते हैं ;
तेरी तस्वीर मेरे दिल से क्यों मिटने न पाती है .

तुम्हारे प्यार का सावन कभी का थम चुका लेकिन ;
हमारी आँख की बरखा कभी थमने न पाती है .

मैं जब ये जानता हूँ , तू मुझे अब मिल नहीं सकती ;
तेरे आने की आहट फिर भी क्यों कानों में आती है .

उजालों में भले ही तू मुझे हासिल न हो लेकिन ;
मेरी हर रात तेरे ख़्वाब का उत्सव मनाती है .

जो हासिल हो नहीं सकता , वही क्यों दिल लुभाता है ;
पहेली ऐसी है , जिसको न दुनिया बूझ पाती है .

फ़िज़ा में ये महक और ये नशा छाया अचानक क्यों ;
हवा , क्या बेवफ़ा महबूब की गलियों से आती है !




Tuesday, May 1, 2012

शुभ प्रभात मित्रों 
आज की भोर कविता

नयी सुबह लेती हैं मुझे खोज
कहते हैं
एक दुनियाँ हैं

जहाँ रहते हैं लोग
मैं तो सिर्फ एक कल्पना हूँ
हूँ एक मृदु सोच
कोई किसी की बातो कों सुनता नहीं
जहाँ एक दूजे पर
बस वे लगाते हैं आरोप
मैं पूरी ताकत से
एक बूंद सा उछलता हूँ
कभी एक पत्ते सा
विपरीत हवा से लड़ता हूँ रोज
वहाँ पर कुछ नियम हैं
जिनके रहना पड़ता हैं अधीन
जहाँ पर लगते हैं व्यक्ति
सिर पर उठाये कुछ ग्रंथों का बोझ
मै तो उबड़ खाबड़ पगडंडी हूँ
जब कोहरे से ढक जाता हूँ
नयी सुबह लेती हैं मुझे खोज ....!!





जिस दिन भूख बगावत वाली सीमा पर आ जायेगी |
उस दिन भूखी जनता सिंहासन को भी खा जाती है...||

मेरी पीढ़ी वालो जागो तरुणाई नीलाम न हो
इतिहासों के शिला लेख पर कल यौवन बदनाम न हो

अपने लोहू में नाखून डुबोने को तैयार रहो
अपने सीने पर कातिल लिखवाने को तैयार रहो

हम गाँधी की राहों से हटते हैं तो हट जाने दो
अब दो - चार भ्रष्ट कांग्रेसी नेता कटते हैं तो कट जाने दो

हम समझौतों की चादर को और नहीं अब ओढेंगे
जो भारत माँ के आँचल को फाड़े हम वो हर बाजू तोड़ेंगे

अपने घर में कोई भी जयचंद नहीं अब छोड़ेंगे
हम गद्दारों को चुन-चुन कर दीवारों में चिन्वायेंगे

बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे


!!... अब याचना नहीं रण होगा और रण बड़ा भीषण होगा ...!!