Tuesday, September 13, 2011

अजनबी



अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ कहें
चलो दूर तक

तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें

चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।

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