Saturday, April 28, 2012

वैसे दोस्ती करना बहुत आसान होता है लेकिन उसे निभाना उतना ही मुश्किल.
ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल में मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,

ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत में किसी एक प्यारे साथी का हाथों में हाथ चाहिए,

कहूँ ना मैं कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल में उसके, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,

उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,

मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,

उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया के बीच मँझदार में,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,

अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,

यूँ तो ‘मित्र’ का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए..!!




जो वतन पे शहीद हो जाते हैं

क्या कभी हमने सोचा है उनके लिए भी,
जो वतन पे शहीद हो जाते हैं!
अपने प्राणों कि आहुति देकर,
वे भारत मां की लाज बचाते हैं!!

जान हथेली पे लेकर,
वे, हम सबकी रक्षा करते हैं!
दुश्मनो के साथ मे लड़ते-लड़ते,
हंसते हुए वे मरते है!!

रेगीस्तान कि तपती गर्मी हो,
या बर्फ़ीली ठंड हवाएं हो!
दुर्गम पहाड़ हो या नदिया,
गहरे समुद्र या घटाएं हो!!

ऐसे भी दिन कभी आते हैं,
जब खाने-पिने कि कोई आश नही!
आंखो मे नींद नही आती,
और दुश्मनो का कोई विस्वाश नही!!

अपने घर-परिवार को छोड़के वे,
हम सब की रक्षा करते हैं!
उनकी यादों को अपने सीने मे,छिपा,
उनकी खुशहाली कि कामना करते है!!

धन्य है ऐसी माताएं,
जिन्होने ऐसे वीरों को जन्म दिया!
ऐसी अमर सुहागिने ,भी धन्य हैं,
जो अपने सुहाग को देश रक्षा मे लगा दिया..!


भ्रष्टाचार कि बगिया देखो,
जो आज बहुत तेजी से फ़ल -फ़ूल रहा है!
बेइमानी की रह पर चल कर,
आदमी अपना ईमान भूल रहा है!!

छोटे अपराध करने वालों को,
सख्त सजाएं दी जाती!
बड़े-बड़े हवाला बाजों को ,
क्लीन चिट है दे दी जाती!!

जन तंत्र नही यह भ्रष्ट्र तंत्र है,
जहां भ्रष्टाचारियों का ही बोल-बाला है!
यहां आम आदमी की आवाजें दबा दी जातीं
हर जगह कोइ न कोइ घोटाला है!!

सत्ता पे अपनी पकड़ बनी रहे,
और सदा वोटों पर मंथन करते रहते!
देश के विकास मे दिलचस्पी कम,
सदा वोटों के विकास मे उलझे रहते!!

पर अब भी अपने सीधे भारत मे,
ईमानदारों के संख्या जादा है!
पर कुछ भ्रष्ट मक्कारों के कारण,
उन्हें हर तरह से सताया जाता है!!
प्रिय ! तुम्हारे साथ के वह पल
या तुम्हारे बिना यह पल
दोनों पल, कैसे हैं ये पल ?
जला रहे हैं मुझे पल पल .
प्रिय ! तन्हाई के यह पल
या फिर मिलन के वह पल
पलक बिछाये बैठा हूँ हर पल ,
कैसे मिलेंगे फिर ये दोनों पल ?
प्रिय ! तुम याद करो वह पल
निश्चल पल में सचल नयनों के हलचल
में रोज याद करता हूँ यह पल
सचल पल में निश्चल नैनों की हलचल.
प्रिय ! यह बिरह का हर पल
या फिर मिलन का वह एक पल
पल में सिमट गया हैं अपना कल
कटे नहीं कट रहे हर एक पल !




रिश्ते अब निभते नहीं..


रिश्ते अब निभते नहीं हमारे बीच
अबिस्वाश की आंखें
और कुढ़न वाली बांते
रिश्तों को जोढते जोढ़ते
चाहत ही टूट जाती हैं हमारे बीच !

अपने सगों का प्यार, बार-बार
हो जाता है तार-तार
अमीरी और गरीबी की दीवार
खढ़ी हो जाती है हमारे बीच !!

रिश्ते जिन्हें पुस्तोंने बड़ी शिद्दत से
खड़े किये थे बरगद विशाल से
पर,फिरभी छोटे हो जाते स्वार्थ से
और बिखर जाते हैं, हमारे बीच !!!

आंखों में,शायद, खटक जाती
एक दुसरे की खुशी
बाते सम्बन्ध की निरर्थक हो जाती
निश्चित बनाती दूरी हमारे बीच
कियों की रिश्ते अब निभते नहीं हमारे बीच
 ...!!

जब सोता है ज़माना खुद से बेखबर होकर,
फिर जाग पड़ता हूँ मैं कुछ बेसबर होकर....

मेरे लब्जो का मेरे राज़ से मिलन,
मेरी खामोशी का रात से मिलन,

और कल का आज से मिलन....
कागज़ का कलम से इश्क होता है,

मेरी आसू मेरी पलकों से मिलते है.
और सबसे बड़ी बात
मैं अपनी तन्हाई को पूरा समय दे पाता हूँ,

दिन भर के किरदार को उतार फेंक खुद से मिलता हूँ,
जाने कितने नकाब मेरे वजन बढ़ा रहे थे,

कही दूर रखे जाते है...........
गले लगाकर रोता हूँ तन्हाई को,

और कभी कभी तो सिसक सिसक कर,
आंसू गला रौंध देते है,
अल्फाजो की कोई जगह नहीं बचती,

खूब मिलन के बाद हल्की हल्की आँखे अब भारी होने लगती है,
और निद्रा मुझे अपने आगोश में जकड़ लेती है,

रह जाते है वो नकाब एक नयी सुबह की तलाश में,
कल फिर एक नया किरदार ओढ़ मुझे दुनिया से लड़ने निकलना जो है.........

जब सोता है ज़माना खुद से बेखबर होकर,
फिर जाग पड़ता हूँ मैं कुछ बेसबर होकर-----------!!

Monday, April 23, 2012

नया सवेरा लाना है

शुभ प्रभात मित्रों प्रस्तुत आज की भोर कविता 
नया सवेरा लाना है:-

चीर कर अँधेरा अब उजालों में कदम बढाना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं.

रोशन हो हर घर का आँगन,
कहीं न छाए मायूसी,
हर बच्चे बूढ़े के होठों पे,
छाए सच्ची ख़ुशी.

रोती आँखों के आंसू को भी अब मुस्काना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं.

शिक्षित हो हर भारतवासी,
बेकारी बन न पाये फांसी,
भूखमरी और लाचारी से,
न छाए चहरों पे उदासी.

सोने की चिडियां हमकों फिर से कहलाना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं.

सत्ता के गलियारों में,
भ्रष्टाचार का हो विनाश,
सरहदों को पार कर,
आतंकवाद न आये पास.

दहशत गर्दों को भी अब शांतिदूत बनाना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं....!!