Sunday, May 27, 2012


ख़ामोशी छोड़ कर चले गए जो हैं , लम्हे ,
बज़्म में वो लौट कर अब नहीं आने वाले !!


तुम्हारी नादानियों से टूट गए जो खिलौने,
इन कमजोर कोशिशों से नहीं जुड़ने वाले !!


दिल से मिट चुके हसीं यादों के जो मंजर,
इन पनीली आँखों से कभी नहीं जाने वाले !!


सोचा तुम्हे पुकार लें करीब जाकर, लेकिन ,
हलक में घुटे लफ्ज़ जबां पे नहीं आने वाले!!


वफ़ा की आस में हमें रुसवाई मिलती रही
दिल में लगे दाग अब यूँ नहीं मिटने वाले !!


इस तंगदिली को हम क्या नाम दें ' ऐ तल्ख़'
ज़फाबाजी के इलज़ाम भी हैं अब लगने वाले !!

खानाबदोशों की महफ़िल है ये दुनिया तमाम
फिर से ये मजमे तमाशे हैं यहाँ सजने वाले !!
 



हर रोज़ नारी को अपमान का घूंट पीना पड़ता है....
एक स्त्री होने का कहर सहना पड़ता है..
कभी बेटी के रूप में...
जिम्मेदार बन खुदके अरमानों का गला घोटा है....
तो माँ के रूप में खुद को ही भुला बैठती है....
हर मोड़ पर एक ऑरत होना ही उसके सपनो का ही दुश्मन बना है....
जिम्मदारी का लिहाफ ओढ़े जब बेटी दूसरे जाती है...
तो उसे वो स्वर्ग बनती है...
मगर हर पल उसका दिल अपने पन को तरसता है....
बस कहने को ही बहु और बेटी एक सामान है....
जब वो पंख फैला अपने सपनों को पूरा करना चाहती है....
तो उसके पंख क़तर दिया जाते हैं...
आज सारा समाज यही कहता है....
लड़का लड़की में आज फर्क कहाँ हैं....
लेकिन हकीकत को जानता हर इंसान है....
हर कदम पे रिश्ते, नाते, रस्मों कि जंजीरों में हमें ही जकड़ा जाता है...
परिवार की शान के नाम पे हमारा ही गला घोटा जाता है...
कभी दहेज़ तो कभी नफरतों कि आग में कई बार झुलसाई गयी हैं...
हमने जब अपना नाम आसमान में लिख दिया है
फिर क्यों हम .. हर मोड़ पर सताई गयी हैं....

हर कदम पे हमें मजबूर किया हैं...
हमारे पैरो को जकड़ दिया है....
जब हमारे कदम बढे भी हैं तो....
उनके हौसलों को वहीं पस्त किया गया है....
हमारा जब कोई वजूद ही नहीं था तो फिर क्यों ?
हर पल दधकती आग में जलने को पैदा किया....
क्यों आखिर क्यों हमें पैदा किया????



एक दीप सूरज के आगे
============

लीक से हटकर अलग
चाहे हुआ अपराध मुझसे,
सच कहूँ, सूरज के आगे
दीप मैंने रख दिया है !

प्रश्नों के उत्तर नये देकर
उलझना जानता हूँ ,
और हर उत्तर में जलते
प्रश्न को पहचानता हूँ !
जाने क्यों संसार मेरे
प्रश्न पर कुछ मौन सा है ,
तोड़ने इस मौन का हर स्वाद
मैंने चख लिया है !

इंद्रधनुषी स्वप्न का बिखराव
मैंने खूब देखा,
रात का रुठा हुआ बर्ताव
मैंने खूब देखा !
पर सुबह की चाह मैंने
ताक पर रखना न जाना,
हर चुनौती को सफल जीवन का
स्वीकृत सच लिया है !

धूल से उठकर लकीरें
याद के जंगल में भटकीं,
और गले में चीख के वे
दर्द के मानिंद अटकीं !
पर मुझे जो आईना था
हर घड़ी निज – पथ सुझाता,
बस उसी के नाम यादों का
झरोखा कर दिया है !

स्वप्न मृत होते नहीं
यदि दीप हरदम दिपदिपायें,
धीरे – धीरे ही सही
जलती वो बाती मुस्कराये !
कोई माने या न माने
मान दे या तुच्छ बोले
जी सकूँ हर अंधेरे में
मैंने ऐसा हठ किया है !

सच कहूँ, सूरज के आगे
दीप मैंने रख दिया है !



धडकते दिल में रहे आप धडकनों की तरह.
जमे ज़हन में मिले रोज़ उलझनों की तरह.


फ़क़त जो सच था न कहने से वो गुरेज़ किया,
शहर तमाम मिला क्यूँ है दुश्मनों की तरह.


रखा ख़याल न एक ज़र्ब भी पड़े तुम पर,
तुम्ही ने समझा हमें क्यूँ है अडचनों की तरह.


सभी ने चौंक के हाथों में ले लिए पत्थर
न रहना चाहिए हमको था दर्पणों की तरह.


सुकूनो चैन तो सारा वो ले गया है लूट,
कि हमसफर भी मिला है तो रहज़नों की तरह.


जियादा देर तेरे संग चल न पायेंगे,
सहेज लेना हमें आखिरी क्षणों की तरह.
अलविदा ……




Saturday, May 19, 2012

मजदूर!
सबके करीब
सबसे दूर
कितने मजबूर!
कभी बन कर
कोल्हू के बैल
घूमते रहे गोल-गोल
ख्वाबों में रही
हरी-भरी घास
बंधी रही आस
होते रहे चूर-चूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
कभी सूरज ने
झुलसाया तन-मन
जला डाला निवाला
लू के थपेड़ों में चपेट
भूख-प्यास ने मार डाला
समझ न पाए
क्यों जमाना
इतना क्रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
कभी कहर बना आसमाँ
बहा ले गया वजूद सारा
डूबते-उतराते निकला दम
पाया नहीं कोई किनारा
निरीह, वेबस आँखों में
उमड़ती रही बाढ़
फिर भी पेट की आग
बुझाने से रहे बहुत दूर
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
कभी कोई बवंडर
उजाड़ कर घरौंदा
पल भर में मिटा गया हस्ती!
तिनका तिनका पैरों तले रौंदा
सोचते ही रह गए
क्यों! हर कोई हम पर ही
करके जोर आजमाइश अपनी
दिखाता है इतना ग़रूर!
सबके करीब
सबसे दूर
मजदूर!
रचना--…कविता रावत




Tuesday, May 15, 2012


ये दुनिया है कैसी,जिसमे कोई नही सुनता !
सब को अपनी-अपनी, नही किसी की चिन्ता है!!
हर तरह के लोग यहा, कई रंग बदलते है!
जिसकी जैसी ईच्छा ,वो वैसे ही करते है!!
मतलब के लिए ये लोग ईमान , बदलते है!
पैसो के लि यहा लोग ,आपस मे लड़ते है!!
कई लोग तड़प कर के बिन भुख से मरते है!
पर बहु लोग खाते -खाते ही मरते है!!
कई बच्चे भी ऐसे ,जिन्हे दूध नही मिलता!
इसिलिए ही ये जीवन उन्हे ,उनका नही मिलता!!
कई पढ़े -लिखे नौ -जवा,जिन्हे काम नही मिलता!
अपने करतब का उन्हे ईनाम नही मिलता!!
दौलत के लिए यहा लोग ईज्जत को बेचते है!
अपने खुशियो का पौधा, खुन से सिचते है!!
ये घुटन भरी दुनिया,जिसमे रहा नही जाता!
हालत को देख-देख करके, कुछ कहा नही जाता!!



Monday, May 14, 2012

कालचक्र में फँसी पृथ्वी
तब भी रहेगी वैसी की वैसी
अपने ध्रुवों और अक्षांशों पर
वैसी ही अवसन्न और आक्रान्त!

धूसर गलियाँ
अहिंसा सिखाते हत्यारे
असीम कमीनेपन के साथ मुस्कराते
निर्लज्ज भद्रजन,
असमय की धूप और अंधड़…
कुछ भी नहीं बदलेगा!
किसी चमत्कार की तरह नहीं आएंगे देवदूत
अकस्मात हम नहीं पहुँच सकेंगे
किसी स्वर्णिम भविष्य में
सत्ताधीशों के लाख आश्वासनों के बावजूद!

पृथ्वी रहेगी वैसी की वैसी!

रहेंगी –
पतियों से तंग आती स्त्रियाँ
फतवे मूर्खता और गणिकाएँ
बनी रहेंगी बाढ़ और अकाल की समस्याएँ
मठाधीशों की गर्वोक्तियाँ
और कभी पूरी न हो सकने वाली उम्मीदें
शिकायतें… सन्ताप…

बचे रहेंगे –
चीकट भक्ति से भयातुर देवता
सांस्कृतिक चिन्ताओं से त्रस्त
भाण्ड और मसखरे
उदरशूल से हाहाकार करते कर्मचारी!
रह जाएगा –
ज़िन्दगी से बाहर कर दी गईं
बूढ़ी औरतों का दारुण विलाप
एक-दूसरे पर लिखी गईं व्यंग्य-वार्ताओं का टुच्चापन
और विलम्वित रेलगाड़ियों का
अवसाद भरा कोरस…

तिथियों के बदलने से नहीं बदलेंगी आदतें
चेहरे बदलेंगे… रंग-रोग़न बदल जाएगा

सोचो लोगो!
ये इक्कीसवीं सदी की सुबह है
क्या तुम ठीक-ठीक कह सकते हो
कि हम किस सदी में जी रहे हैं?

Sunday, May 6, 2012

ज़फ़ा की ही अदा तुम हुस्न वालों को क्यों आती है ;
किसी का दिल बहलता है , किसी की जान जाती है .

उतरता हूँ मैं अपनी छत से जितना मिलने को तुझसे ;
अकड़ गर्दन की तेरी उतनी ही क्यों बढ़ती जाती है .

तू है आईना , तुझमे अक्स मिटते बनते रहते हैं ;
तेरी तस्वीर मेरे दिल से क्यों मिटने न पाती है .

तुम्हारे प्यार का सावन कभी का थम चुका लेकिन ;
हमारी आँख की बरखा कभी थमने न पाती है .

मैं जब ये जानता हूँ , तू मुझे अब मिल नहीं सकती ;
तेरे आने की आहट फिर भी क्यों कानों में आती है .

उजालों में भले ही तू मुझे हासिल न हो लेकिन ;
मेरी हर रात तेरे ख़्वाब का उत्सव मनाती है .

जो हासिल हो नहीं सकता , वही क्यों दिल लुभाता है ;
पहेली ऐसी है , जिसको न दुनिया बूझ पाती है .

फ़िज़ा में ये महक और ये नशा छाया अचानक क्यों ;
हवा , क्या बेवफ़ा महबूब की गलियों से आती है !




Tuesday, May 1, 2012

शुभ प्रभात मित्रों 
आज की भोर कविता

नयी सुबह लेती हैं मुझे खोज
कहते हैं
एक दुनियाँ हैं

जहाँ रहते हैं लोग
मैं तो सिर्फ एक कल्पना हूँ
हूँ एक मृदु सोच
कोई किसी की बातो कों सुनता नहीं
जहाँ एक दूजे पर
बस वे लगाते हैं आरोप
मैं पूरी ताकत से
एक बूंद सा उछलता हूँ
कभी एक पत्ते सा
विपरीत हवा से लड़ता हूँ रोज
वहाँ पर कुछ नियम हैं
जिनके रहना पड़ता हैं अधीन
जहाँ पर लगते हैं व्यक्ति
सिर पर उठाये कुछ ग्रंथों का बोझ
मै तो उबड़ खाबड़ पगडंडी हूँ
जब कोहरे से ढक जाता हूँ
नयी सुबह लेती हैं मुझे खोज ....!!





जिस दिन भूख बगावत वाली सीमा पर आ जायेगी |
उस दिन भूखी जनता सिंहासन को भी खा जाती है...||

मेरी पीढ़ी वालो जागो तरुणाई नीलाम न हो
इतिहासों के शिला लेख पर कल यौवन बदनाम न हो

अपने लोहू में नाखून डुबोने को तैयार रहो
अपने सीने पर कातिल लिखवाने को तैयार रहो

हम गाँधी की राहों से हटते हैं तो हट जाने दो
अब दो - चार भ्रष्ट कांग्रेसी नेता कटते हैं तो कट जाने दो

हम समझौतों की चादर को और नहीं अब ओढेंगे
जो भारत माँ के आँचल को फाड़े हम वो हर बाजू तोड़ेंगे

अपने घर में कोई भी जयचंद नहीं अब छोड़ेंगे
हम गद्दारों को चुन-चुन कर दीवारों में चिन्वायेंगे

बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे


!!... अब याचना नहीं रण होगा और रण बड़ा भीषण होगा ...!!


Saturday, April 28, 2012

वैसे दोस्ती करना बहुत आसान होता है लेकिन उसे निभाना उतना ही मुश्किल.
ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल में मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,

ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत में किसी एक प्यारे साथी का हाथों में हाथ चाहिए,

कहूँ ना मैं कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल में उसके, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,

उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,

मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,

उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया के बीच मँझदार में,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,

अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,

यूँ तो ‘मित्र’ का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए..!!




जो वतन पे शहीद हो जाते हैं

क्या कभी हमने सोचा है उनके लिए भी,
जो वतन पे शहीद हो जाते हैं!
अपने प्राणों कि आहुति देकर,
वे भारत मां की लाज बचाते हैं!!

जान हथेली पे लेकर,
वे, हम सबकी रक्षा करते हैं!
दुश्मनो के साथ मे लड़ते-लड़ते,
हंसते हुए वे मरते है!!

रेगीस्तान कि तपती गर्मी हो,
या बर्फ़ीली ठंड हवाएं हो!
दुर्गम पहाड़ हो या नदिया,
गहरे समुद्र या घटाएं हो!!

ऐसे भी दिन कभी आते हैं,
जब खाने-पिने कि कोई आश नही!
आंखो मे नींद नही आती,
और दुश्मनो का कोई विस्वाश नही!!

अपने घर-परिवार को छोड़के वे,
हम सब की रक्षा करते हैं!
उनकी यादों को अपने सीने मे,छिपा,
उनकी खुशहाली कि कामना करते है!!

धन्य है ऐसी माताएं,
जिन्होने ऐसे वीरों को जन्म दिया!
ऐसी अमर सुहागिने ,भी धन्य हैं,
जो अपने सुहाग को देश रक्षा मे लगा दिया..!


भ्रष्टाचार कि बगिया देखो,
जो आज बहुत तेजी से फ़ल -फ़ूल रहा है!
बेइमानी की रह पर चल कर,
आदमी अपना ईमान भूल रहा है!!

छोटे अपराध करने वालों को,
सख्त सजाएं दी जाती!
बड़े-बड़े हवाला बाजों को ,
क्लीन चिट है दे दी जाती!!

जन तंत्र नही यह भ्रष्ट्र तंत्र है,
जहां भ्रष्टाचारियों का ही बोल-बाला है!
यहां आम आदमी की आवाजें दबा दी जातीं
हर जगह कोइ न कोइ घोटाला है!!

सत्ता पे अपनी पकड़ बनी रहे,
और सदा वोटों पर मंथन करते रहते!
देश के विकास मे दिलचस्पी कम,
सदा वोटों के विकास मे उलझे रहते!!

पर अब भी अपने सीधे भारत मे,
ईमानदारों के संख्या जादा है!
पर कुछ भ्रष्ट मक्कारों के कारण,
उन्हें हर तरह से सताया जाता है!!
प्रिय ! तुम्हारे साथ के वह पल
या तुम्हारे बिना यह पल
दोनों पल, कैसे हैं ये पल ?
जला रहे हैं मुझे पल पल .
प्रिय ! तन्हाई के यह पल
या फिर मिलन के वह पल
पलक बिछाये बैठा हूँ हर पल ,
कैसे मिलेंगे फिर ये दोनों पल ?
प्रिय ! तुम याद करो वह पल
निश्चल पल में सचल नयनों के हलचल
में रोज याद करता हूँ यह पल
सचल पल में निश्चल नैनों की हलचल.
प्रिय ! यह बिरह का हर पल
या फिर मिलन का वह एक पल
पल में सिमट गया हैं अपना कल
कटे नहीं कट रहे हर एक पल !




रिश्ते अब निभते नहीं..


रिश्ते अब निभते नहीं हमारे बीच
अबिस्वाश की आंखें
और कुढ़न वाली बांते
रिश्तों को जोढते जोढ़ते
चाहत ही टूट जाती हैं हमारे बीच !

अपने सगों का प्यार, बार-बार
हो जाता है तार-तार
अमीरी और गरीबी की दीवार
खढ़ी हो जाती है हमारे बीच !!

रिश्ते जिन्हें पुस्तोंने बड़ी शिद्दत से
खड़े किये थे बरगद विशाल से
पर,फिरभी छोटे हो जाते स्वार्थ से
और बिखर जाते हैं, हमारे बीच !!!

आंखों में,शायद, खटक जाती
एक दुसरे की खुशी
बाते सम्बन्ध की निरर्थक हो जाती
निश्चित बनाती दूरी हमारे बीच
कियों की रिश्ते अब निभते नहीं हमारे बीच
 ...!!

जब सोता है ज़माना खुद से बेखबर होकर,
फिर जाग पड़ता हूँ मैं कुछ बेसबर होकर....

मेरे लब्जो का मेरे राज़ से मिलन,
मेरी खामोशी का रात से मिलन,

और कल का आज से मिलन....
कागज़ का कलम से इश्क होता है,

मेरी आसू मेरी पलकों से मिलते है.
और सबसे बड़ी बात
मैं अपनी तन्हाई को पूरा समय दे पाता हूँ,

दिन भर के किरदार को उतार फेंक खुद से मिलता हूँ,
जाने कितने नकाब मेरे वजन बढ़ा रहे थे,

कही दूर रखे जाते है...........
गले लगाकर रोता हूँ तन्हाई को,

और कभी कभी तो सिसक सिसक कर,
आंसू गला रौंध देते है,
अल्फाजो की कोई जगह नहीं बचती,

खूब मिलन के बाद हल्की हल्की आँखे अब भारी होने लगती है,
और निद्रा मुझे अपने आगोश में जकड़ लेती है,

रह जाते है वो नकाब एक नयी सुबह की तलाश में,
कल फिर एक नया किरदार ओढ़ मुझे दुनिया से लड़ने निकलना जो है.........

जब सोता है ज़माना खुद से बेखबर होकर,
फिर जाग पड़ता हूँ मैं कुछ बेसबर होकर-----------!!

Monday, April 23, 2012

नया सवेरा लाना है

शुभ प्रभात मित्रों प्रस्तुत आज की भोर कविता 
नया सवेरा लाना है:-

चीर कर अँधेरा अब उजालों में कदम बढाना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं.

रोशन हो हर घर का आँगन,
कहीं न छाए मायूसी,
हर बच्चे बूढ़े के होठों पे,
छाए सच्ची ख़ुशी.

रोती आँखों के आंसू को भी अब मुस्काना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं.

शिक्षित हो हर भारतवासी,
बेकारी बन न पाये फांसी,
भूखमरी और लाचारी से,
न छाए चहरों पे उदासी.

सोने की चिडियां हमकों फिर से कहलाना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं.

सत्ता के गलियारों में,
भ्रष्टाचार का हो विनाश,
सरहदों को पार कर,
आतंकवाद न आये पास.

दहशत गर्दों को भी अब शांतिदूत बनाना हैं,
कर रात को विदा अब नया सवेरा लाना हैं....!!



Saturday, January 21, 2012

हे जनता तुम्हें अब बस चुप रहना है
हम जो सितम ढाये तुमको सहना है
तुम्ही ने तो हमे ये राज पाट सौंपा है
अक्सर चुनावो में भारत हम पर थोपा है

हमने इतना भरमाया तुम को अपनी चालों से
क्या तुम समझ नही पाये कुछ इतने सालों से
हर पल तुमको उलझाया है हमने अपने नारो से
अमीर गरीब का भेद बढ़ाया अपने झूठे वादो से


आजादी से अब तक हमने बस खानदान को चुना है
नेहरू इन्दिरा, राजीव सोनिया का ताना बाना बुना है
राहुल प्रियंका को अभी बस थोड़ा सा इंतजार करना है
तब तक हमें बस आपको कुछ और बेवकूफ बनाना है

प्रश्न कोई हो हमने तो बस गुजरात सबको दिखाया है
1984 के दंगो को स्वाभिमान हमने अपना बनाया है
सत्ता जब अपनी हो तो कोटरोची को हमने बचाया है
भोपाल गैस कांड के दोषी को देश से हमने भगाया है

प्रमुख विपक्ष को हमने हरदम भगवा रंग मे झौका है
इस नीति के कारण हमे मिल जाता हर बार मौका है
अल्पसंख्यंक का पत्ता खेला है विपक्ष को सत्ता से रोका है
विपक्ष अगर भूल भी जाये तो अयौध्या को खूब सेका है

हमने अपनी चालों से देश में ‘तहलका’ खूब मचाया है
यूँ विपक्ष को स्टिंग मे घेर, उनको हमने चुप कराया है
2-जी और कामनवेल्थ खेलों से हमने लिया फायदा है
अफजल-कसाब को कुछ न होने देंगे ये हमारा वायदा है

कालाबाजारियों से अपना कमीशन बांध लिया है
अपना पैसा हमने स्विस बंकों मे जमा किया है
भ्रष्टाचार को तो हम सबने आज अपना लिया है
कोई कुछ कहे हमने तो अब खूब कमा लिया है

अन्ना रामदेव की मांगो को आज ठेंगा दिखाया है
लोकपाल या भ्रष्टाचार के मुद्दे को हमने भुलाया है
बाबा के समर्थको को तो डंडों का कहर दिखाया है
तैयार रहना, अभी असली रूप आपको दिखाना है

राजनीति के रंग निराले भैया
चलते हैं तीर और भाले भैया

बिन पेंदी के लोटा हैं सब
रोज ही बदले पाले भैया

फितरत की क्या बात करें हम
दिल के हैं सब काले भैया

सुबह शाम उड़ायें छप्पन भोग ये
जनता के लिए महँगी है दालें भैया

चुनाव भर घुमे ये घर-घर पैदल
कार में भी मंत्रीजी को आये छाले भैया

करते हैं सपरिवार विदेश में शॉपिंग
आमजन को है खाने के लाले भैया

संसद को बना दे ये आरोपों का अखाड़ा
विकास की बात पे जुबां पे लगे ताले भैया

रहती है इन्हें बस कुर्सी की ही चिंता
कुर्सी के लिए देश को भी बेच डाले भैया

बोफोर्स, चारा, टेलीकॉम, हवाला
इनके हैं बड़े-बड़े घोटाले भैया

राजनीति के रंग निराले भैया
दिल के हैं सब काले भैया

Wednesday, January 18, 2012

गंगा-स्नान ...
-----------
एक दिन मैंने भी सोचा
क्यों न - मैं भी गंगा-स्नान करूँ !
इसलिए,
ब्रह्ममुहूर्त में पहुँच गया, मैं सीधे गंगा तट पे !
पर
वहां, भीड़ देख चंडालों की, मैं थोड़ा-सा सहम गया !

सारे तट पर -
डुबक-डुबक ... भीड़ बड़ी थी, चोरों और चंडालों की !
भीड़ देख कर मैंने सोचा -
नहीं, अभी नहीं वो घड़ी है आई
कि -
मैं गंगा-स्नान करूँ !!

आज, यहाँ पर, पाप-पुण्य की बेला है
न जाने किसको, क्या मिलना - क्या देना है
चहूँ ओर ... डुबक-डुबक ...
देखेंगे, फिर देखेंगे, फिर किसी दिन देखेंगे !
आज नहीं वो बेला है
सच ! आज, गंगा-स्नान झमेला है !!
मैं जिंदा हूँ 
अन्याय का खिलाफत मैं कर नहीं पाता
कुशासन-सुशासन का फर्क समझ नहीं पाता 
प्रदूषित हवा में सांस लेता हूँ 
पर मैं जिंदा हूँ 

सरकारी तंत्र से शोषित हूँ मैं
बिना सबूत आरोपित हूँ मैं
खुद को साबित मैं कर नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ

दिल से चीत्कार उठती है
मन में हाहाकार मचती है
होंठों से कोई शब्द निकल नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ

रक्त में उबाल अब भी है
भावनाओं में अंगार अब भी है
बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ

क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से
काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से
नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों का ,
एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ
सपनो का दर्पण देखा था
सपनो का दर्पण तोड़ दिया 
ये प्यार का दामन हमने तो 
आंचल से तुम्हारे जोड़ लिया
ये ऐसी गांठ है उल्फत की
जिसको न कोई भी खोल सका
तुम आन बसे जब इस दिल में
दिल फिर तो कही ना डोल सका
ओ प्यार के सागर हम तेरी
लहरों में नाम डुबो बैठे
तुम पढ़ ना सके ख़ामोशी को
और हम आवाज को खो बैठे
ज़िन्दगी की भाग दौड मे
हर पल यों गुजर रहा है
‘मरने से पहले तू जी ले’
किसने ये क्या खूब कहा है

हंसीन लम्हें है कुछ थोडे
कितना दुख तूने सहा है
साथ चलेंगे साथ रहेंगे
मै वही हूं तू जहां जहां है

कोई चाहेगा क्या किस को
जितना मैने तुम्हें चाहा है
दयार जो मिरा का मंदिर मे
तेरी जगह दिल मे वहां है
वक़्त का मुझे कोई होश नही
जिस्म मे मेरे कोई जोश नही
तरसाते हो तुम तनहाई मे
और कहते हो ‘मेरा कोई दोष नही’

एक अंजाना सा आघोश कही
तो हलका सा सरगोश कही
सुनाई आती है आवाज तेरी
चुप रहो या रहो दूर खामोश कही

जमाने का मुझ पे रोष सही
पहचान मेरी फरामोश सही
हो जिम्मेदार तुम ही मेरे
खुद को मान लो चाहे निर्दोश सही

Tuesday, January 17, 2012


उन्हे शौक बदनाम करनेका है
हमे शौक बदनाम होनेका है
 
न मिलना,न चिठ्ठी,नही जिक्र भी
इरादा हमे अब भुलानेका है

 
पलटके जो देखा पशेमॉं है वो
नया खेल नजरे चुरानेका है 
 
घटासे वो बरसे,हवाओमें बोले
बहाना हमे ये सतानेका है

 
खुशीका है भूली वो इजहार भी
ये अंदाज गर मुस्कुरानेका है
 
कभी अक्स देखे तो हस लेते है
हमीसे हमे गम छुपानेका है

 
लिपट जाती है भीगी बेलासी वो
यही लुफ़्त उनको मनानेका है
 
कभी दूरिया भी हो हममें सनम
समय वो दिलोंको परखनेका है
  
न मुझको पता है,न तुमको खबर”
’है कुछ बात’...कहना जमानेका है
 
मुझे जानना ना है मुमकिन तुम्हे
ये चेहरा मेरा बस दिखानेका है

संसद के दरवाजो से चीत्कार सुनाई देती है
कुछ खोटे पापी सिक्को की अब हार सुनाई
देती है,
मेरा जन-गन वाला भारत
भूखा प्यासा बैठा है,
सविधान का रखवाला कुर्सी पर
बैठा एठा है
कोई तिरंगा चीर रहा है सरे आम
बाजारों में,
कोई मसीहा पूज रहा है एटम बम
हथियारों में,
कोई कोई मेरे देश का सौदा करने लगता है,
कोई विदेशी मुद्रा अपने मठ में भरने
लगता है,
कोई भारतवासी अपने घर में भूखा सोता है,
रोटी एक कमा के लाता बच्चा खाके
सोता है
कोई कुछ कुछ मिला रहा है नमक दाल और
शक्कर में
कोई सोनावाड़े जला है माफ़िआओ के चक्कर
में
कोई विधवा के
फ्लैटों को अपना कहना लगता है,
कोई मवाली हत्यारा संसद में रहने
लगता है
कोई खबरे भेज रहा है गैर पडोसी देशो में,
कोई जीवन दूढ़ रहा है बचे हुए अवशेषों में
कोई उची कुर्सी वाला हाथ जोड़ रह
जाता है
और करोडो का घोटाला ए-राजा कर
जाता है
काला धन मेरे भारत
का पड़ा विदेशी मुल्को में
जासूस खबरे बेच रहा है नाम मात्र के
शुल्को में
कही जले है लाखो गाँधी सच्चाई के कारण
जी
जन गन मन का नहीं करपाते नेता कुछ
उच्चारण जी
देश प्रेम का ढोंग घिनोना ढोंगी मोह
को देखो जी
बापू जी की पुन्य तिथि पर फैशन
शो को देखो जी
मैंने तो हरदम कोसा है भ्रस्टाचारी ताकत
को जी
मै गद्दारी कहता महगाई और मिलावट को
कोई नेता नाचे नंगा नेहरु वाली धरती पे
कोई ताली पीट रहा है भारत देश
की अर्थी पे
कोई ठुमके लगा रहा है फैशन वाले रैम्पो पर
कोई किडनी चुरा रहा है मुफ्त
चिक्तिसा कैम्पों पर
सोने की चिड़िया का हिंद आवाज
लगता सुन लो जी
दीन हीन अध् मारा पड़ा फ़रियाद
सुनाता सुन लो जी
मुझको तो केवल लूटा है सत्ताधारी ताकत
ने
और सुंहागा लगा दिया है हिंसा लूट
मिलावट ने
शब्दों में जो बध न पाये ऐसी मेरी हालत है
डूब मरो ए गद्दारों ये गाँधी वाला भारत
है
ऊँगली उठाना घाव कुरेदना यही लक्ष्य
नहीं मेरा जी
भारत देश लुटेरो का ही नहीं सिर्फ एक
डेरा जी
यहाँ अब भी बचे हुए है गाँधी के विचार जी
इधर उधर बिखर रहे गाँधी के विचार जी
विश्वास नहीं टूटा अब तिलक घोख्ले
बुद्धो पर
देश भक्त अब सोच रहे है नवनीति के
मुद्दों पर
हम भी आये तुम भी आओ करने सोच विचार
जी
भ्रस्टाचारी पापिओ का करदे का तमाम
जी
रोके मिलावट खोरी चीजो की चोर
बाजारी को
उत्पादन खूब बढ़ा के अपना भूले हम
लाचारी को
संसार शिरोमणि था ये देश फिर से बने
महान जी
मेरा भारत प्यारा भारत जाए न
इसकी शान जी
मेरा भारत प्यारा भारत जाए न
इसकी शान जी