Saturday, August 6, 2011

"कभी बिखर जाना धूप की तरह"

कभी बिखर जाना धूप की तरह,
खूब चमक जाना धूप की तरह।

सर्द जंगलों का है ये सफर,
गर्म हवा बन जाना धूप की तरह।

आवारगी देख लेना परिंदों की,
छतों में घूम आना धूप की तरह।

सायों में पलते हैं यहां अंधेरे,
उजाला बन जाना धूप की तरह।

मेरी रात करती है इंतजार तेरा,
शाम में घुल जाना धूप की तरह।

घूम आऊं वहां, दिल चाहे जहां,
सफरे-हवा1 बन जाना धूप की तरह।

मिलते ही लिपट जाना बागों में,
दरिया-ए-खुश्‍बू2 बन जाना धूप की तरह।

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