Tuesday, November 1, 2011

मिला वो भी नहीं करते मिला हम भी नहीं करते


मिला वो भी नहीं करते मिला हम भी नहीं करते,
वफ़ा वो भी नहीं करते दगा हम भी नहीं करते,

उन्हें रुसवाई का दुःख हमें तन्हाई का डर,
गीला वो भी नहीं करते शिकवा हम भी नहीं करते,

किसी मोड पर मुलाकात हो जाती है अक्सर,
रुका वो भी नहीं करते ठहरा हम भी नहीं करते,

जब भी देखते है उन्हें, सोचते है कुछ कहे उनसे,
सुना वो भी नहीं करते, कहा हम भी नहीं करते,

लेकिन ये भी सच है की उन्हें भी है मोहबत हमसे,
इंकार वो भी नहीं करते, इज़हार हम भी नहीं करते..!!

Monday, September 19, 2011

सूरज की किरण हूं यूं चमक छोड़ जाऊंगा..


सूरज की किरण हूं यूं चमक छोड़ जाऊंगा..

कोई कहता है जिंदगी जीने का नाम है
कोई कहता है जिंदगी पीने का नाम है
दोस्तों ये सब नजर-नजर का खेल है
जिंदगी जख्मों से भरे सीने का नाम है|

चलो तस्कीद कर लें अब अपनी बात की।
आने वाली फिर इक नई मुलाकात की।
सुना है मौसमे बहार भी आने को है।
दास्तां कोई सुना रहा चांदनी रात की।

बेवफा नहीं हूं तो कैसे दिल तोड़ जाऊंगा
सूरज की किरण हूं यूं चमक छोड़ जाऊंगा।
वादा नहीं करता जिंदगी ये कर्जदार है
न जाने किस मोड़ पर सांसें छोड़ जाऊंगा।

Saturday, September 17, 2011

"दूर तक जिसकी नज़र चुपचाप जाती ही नहीं"


दूर तक जिसकी नज़र चुपचाप जाती ही नहीं

हम समझते हैं समीक्षा उसको आती ही नहीं

आपका पिंजरा है दाना आपका तो क्या हुआ
आपके कहने से चिड़िया गुनगुनाती ही नहीं

भावना खो जाती है शब्दों के जंगल में जहाँ
शायरी की रोशनी उस ओर जाती ही नहीं

आप कहते हैं वफ़ा करते नहीं हैं इसलिए
जिस नज़र में है वफ़ा वह रास आती ही नहीं

झाड़ियों में आप उलझे तो उलझकर रह गए
आप तक बादे सबा जाकर भी जाती ही नहीं

शेर की दोस्तों अभी भी शेरीयत है ज़िंदगी
इसके बिना कोई ग़ज़ल तो गुदगुदाती ही नहीं

Wednesday, September 14, 2011

गलतीयों से जुदा, वो भी नहीं मैं भी नहीं...


गलतीयों से जुदा, वो भी नहीं मैं भी नहीं...
दोनो इन्सान हैं.. खुदा वो भी नहीं मैं भी नहीं...

.........वो मुझे मैं उसे इल्जाम देते हैं मगर....
अपने अन्दर झांकते, वो भी नहीं मैं भी नहीं...
...
गलत-फहमियों ने कर दी, दोनो में पैदा दूरीयाँ...
.. वरना फितरत के बुरे वो भी नहीं मैं भी नहीं...

इस घुमती जिन्दगी में दोनो का सफर जारी रहा..
एक लम्हे को रूकते वो भी नहीं मैं भी नहीं......

मानते दोनो बहुत एक दूसरे को हैं मगर...
ये हकीकत जानते वो भी नहीं मैं भी नहीं...

Tuesday, September 13, 2011

"अपनी चाहत का मैं खुल कर इज़हार ना कर सका"


अपनी चाहत का मैं खुल कर इज़हार ना कर सका,
कुबूल है मुझे की तुझ से इतना प्यार ना कर सका,

ना पूरी कर सका कभी छोटी सी भी ख्वाहिश तेरी,
आजिज़ था मैं हर लम्हा पर इकरार ना कर सका,

क्या वजह रही होगी जरा सोचना तू ये तन्हाई में,
बेवफा कहा तुने मुझे और मैं तकरार ना कर सका,

डर--यार तक दर था उस से अब वों ही साथी हैं,
पागल था खुद की परछाई पे ऐतबार ना कर सका,

सच कहा था नसीब में है वों ही रब देगा,
वों दर्द पे दर्द देता रहा मैं इनकार ना कर सका.

"अन्याय हर तरफ फैला है पूंजी का बोलबाला है"


अन्याय हर तरफ फैला है
पूंजी का बोलबाला है
सच का सर्वत्र मुँह काला है
ये हालात तो बदलने ही होंगे
बदलाव के हालात बनाने होंगे
तभी तो इंकलाब आएगा
हर जन अपना हक पाएगा
पर उसके पहले बहुत से काम
जो अभी तक पूरे नहीं हुए
वो सब के सब निपटाने होंगे
वो कोने में जिसे अधमरा करके
बड़े दिनों से डाल रखा है
वो अब भी, हद है आखिर,
कभी-कभार बड़-बड़ किए रहता है
उसे सबक सिखाना होगा
उसके भौंकने को बंद कराना होगा
पहला बड़ा काम तो यही है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?
फिर आपस के झगड़े भी तो हैं
तगड़े हैं, एक से एक बढ़ के हैं
एक-दूसरे को सबक सिखाना होगा
एक-दूसरे का भौंकना बंद कराना होगा
दूसरा बड़ा काम यह भी तो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?
फिर कुछ डरे सहमे
असुरक्षित लोगों ने
अपनी बुद्धि का
अपने ज्ञान का
और तो और
अपनी प्रतिभा का!
(हद है!, हद है!
कितनी अकड़ है!)
आतंक फैला रखा है
यहीं, इंकलाबियों के बीच!
उनका मटियामेट कर के ही
सच्चे इंकलाबी दम ले सकते हैं
उन्हें अपने साथ लाकर नहीं
एक तीसरा बड़ा काम यह जो है
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?
ऐसे कितने ही काम और हैं
जिन्हें निपटाना है
इंकलाब के पहले
इसी से याद आया
एक काम तो यही है
कि इन कामों में
जो अड़चन पहुँचाए
उसे हड़का-हड़का के
आपसी झगड़े
ज़रा देर को भुला के
मिल-जुल कर
ऊपर पहुँचाया जाए
इसके बिना आगे कैसे बढ़ सकते हैं?

"तुम जो होते तो मुझे कितना सहारा होता"


Tum jo hote to mujhay kitna sahara hota
Main ne auron ko na dukh mian pukara hota

Jitni shiddat se wabasta tha main tujh se
Kis tarh mera, tere bagher guzara hota

Mujh ko ye soch hi kafi hai jalane k lye
Main na hota to koi or tumhara hota

Or hum beth k khamoshi se rote rehte
Shaam hoti, sharaab hoti, dariya ka kinara hota..!

अजनबी



अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ कहें
चलो दूर तक

तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें

चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।

Monday, August 8, 2011

"Mujhe Azmane Wale Mujhe Azman"


Mujhe Azmane Wale Mujhe Azman ke Roye
Meri Dastane Hasrat Suna Suna ke Roye

Teri Bewafaiyon Par, Teri Kaj Adaiyon Par
Kabhi Sar chupa Ke Roye, Kabi Munh Chupa Ke Roye

Jo Sunai Anjuman Men Shab-e0 Gham Ki Aap-biti
Kabhi Ro ke Muskaraye, Kabhi Muskara Ke Roye

Main Hun Be-Watan Musafir, Mera Naam Bekasi Hai
Mera Koi Bhi Nahin Hai Jo Gale Laga Ke Roye

Mere Paas Se Guzar Kar Mera Haal Tak Na Poocha
Main Yeh Kaise Maan Jaun Ke Woh Dur Ja KE Roye
…!!

"karz teri jafaa kaa main adaa"


karz teri jafaa kaa main adaa kaise karun
tu hi bataa tujhse main wafaa kaise karun

jab apnone hi lutaa hai jee bhar ke mujko
main gairon se bhalaa gilaa kaise karun

tujh pe nisaar kiya thaa jism-o-jaan kabhi
ab teri barbaadi kii maiN duaa kaise karun

kahte hai sabhi tujhe bhulana hi munaasib
apne hii seeney se Dil ko judaa kaise karun

akele chalne kii aadat na rahi Diya ko ab
safar zindagi ka tay tere binaa kaise karun...!

"Kahan Ye Bas Mein K Hum Khud Ko"


Kahan Ye Bas Mein K Hum Khud Ko Hosla Detay ..!!
Yahi Bohat Tha K Har Ghum Pe Muskura Detay..!!

Hawa ki Doorr Ulajti Jo Ungliyun Se Kabi..!!
Hum Aasmaan Pe Tera Naam Tak Saja Detay..!!

Hamarey Aks Mein Hoti Jo Zakhm-E-Dil Ki Jalak...!!
Hum Aai'ney Ko Bhi Apni Tarah Rulaa Detay..!!

Humein Bhi Roshin'ion Par Jo Dastaras Hoti ..!!
Kabi Chiragh Jalatey Kabhi Bhujaa Detay..!!

Hamaray Paoon Hawa'on Ki Zadh Mein Thay Warna..!!
Guzarti Umer Ko Rukk Rukk kar Sadaa Detay...!!

Ab Uski Yaad Say Uska Badan Tarashtey Hein..!!
Wo Khuwaab B Tou Nahi Tha K Hum Bhula Detay..!!

Ussi K Wastay MOHSIN Kahi Hai Taza Ghazal..!!
Hum Uski Saalgira Par Ab Aur Kiya Detay...?????

Jine ki har dil ko aas hoti hai


thus dh gj fny dks vkl gksrh gS
I;kj dh gj utj esa I;kl gksrh gS]

dHkh dPph cfLr;ksa esa tk dj ns[kksa
ftanxh fdl dnj cs fyckl gksrh gS]

nkSyr dk u’kk cqjh pht gS I;kjs
;s lnk dc fdlh ds ikl gksrh gS]

Xkjhc cPpksa dks derj u tku u
utj bu dh gene lkal gksrh gS]

mu cq>rh vka[kksa dks xkSj ls ns[kuk
ped mu esa ,d [kkl gksrh gS]

oks [kq’kc[r gS ds jkr tc rd
?kj u ykSVs eka mnkl gksrh gSA

(¨`·.·´¨) Smiling Always,
 `·.¸(¨`·.·´¨)
Keeps Your face
(¨`·.·´¨)¸.·´
Shining & Loving!
 `·.¸.·´

Sunday, August 7, 2011

"इस परदेश में जब बच्चों की"

दुश्मन को भी गले लगा कर ख़ुश हो लेता हूँ
दर्द पराया दिल में बसा कर ख़ुश हो लेता हूँ

इस परदेश में जब बच्चों की याद सताती है
चंद खिलौने घर में लाकर ख़ुश हो लेता हूँ

जब सूरज के नखरे कुछ ज़्यादा बढ़ जाते हैं
हर आँगन में दीप जला कर ख़ुश हो लेता हूँ

रास नहीं आता जब मुझको साथ सयानो का
बच्चों की दुनिया में आकर ख़ुश हो लेता हूँ

आग बुझाने की कोशिश में औरों के घर की
अक्सर अपने हाथ जलाकर ख़ुश हो लेता हूँ

पेट काटकर अपना, अपने बीवी बच्चों का
पैसे मैं दो चार बचाकर ख़ुश हो लेता हूँ

जब-जब याद किसी की आकर बहुत रुलाती है
कोई ग़ज़ल अनिल की गाकर ख़ुश हो लेता हूँ

"अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने"

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों तक
किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं

रचनाकार: निदा फ़ाज़ली

"अपनी ख़ुशियाँ अपने सपने सब के सब बेकार"

अपनी खुशियाँ अपने सपने सब के सब बेकार हुए
फूलों जैसे लोग भी जाने क्यों जलते अंगार हुए

अपने ही कुछ भाई आकर दुश्मन के बहकावे में
अपने घर के टुकड़े टुकड़े करने को तैयार हुए

पुल होने का दावा करते फिरते हैं जो यहाँ- वहां
तेरे मेरे बीच में अक्सर लोग वही दीवार हुए

अज़ब बात है जब भी सोचा, कुछ दुनिया का हाल सुनें
सदा लूट व हत्याओं की खबरों से दो चार हुए

वहाँ वहाँ सूरज के आगे कोई बादल आ ठहरा
इस बस्ती में जहाँ सवेरा होने के आसार हुए

जो इस्पाती ढाल बने थे कभी हमारे सीने पर
जाने क्या हो गया उन्हें अब लोग वही तलवार हुए

इतनी बार खरीदे बेचे गए कि अब ये लगता है
जैसे हम इक जिन्स हुए हों, सब रिश्ते बाज़ार हुए..!!

"अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने"

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों तक
किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं

रचनाकार: निदा फ़ाज़ली

"हर एक को कुटुंब में अपने"

हर एक को कुटुंब में अपने सा ढालना
कितना कठिन है दोस्तों घर को संभालना

आनंद की फुहार है चंदन की गंध है
जादू जगाता माँओं की बाहों का पालना

वो माँगता है एक खिलौना ही तो जनाब
सोचें कि क्या ये ठीक है बच्चे को टालना

जिसको उजाड़ कर गए बच्चे शरारती
होता न काश वो किसी चिड़िया का आलना

खुल कर निकाल लीजिए दिल की भड़ास को
आसान है ज़माने पे कीचड़ उछालना

ए 'प्राण' रास आई है किस मन को दुश्मनी
ये तो गली है संकरी खुद को निकालना..!!

"Kya khabar tum ko dosti kya hai"

Kya khabar tum ko dosti kya hai
Ye roshni bhi hai andhera bhi hai
Khwahishon se bhara jazeera bhi hai
Bohat anmol ek heera bhi hai

Dosti ek haseen khwab bhi hai
Pass se dekho to sarab bhi hai
Dukh milne pe yeh azaab bhi hai
Aur yeh pyaar ka jawaz bhi hai

Dosti yoon to maya jaal bhi hai
Ek haqeeqat bhi hai khayal bhi hai
Kabhi furqat kabhi vissal bhi hai
Kabhi zameen kabhi falak bhi hai

Dosti jhoot bhi hai such bhi hai
Dil main reh jai to kassak bhi hai
Kabhi ye haar kabhi jeet bhi hai
Dosti saaz bhi sangeet bhi hai

Sheir bhi nazam bhi geet bhi hai
Wafa kya hai wafa bhi dosti hai
Dil se nikli Dua bhi dosti hai
Bas itna samajh lo tum
Pyaar ki inteha bhi dosti hai..!!

"दोस्ती और प्यार"

दोस्ती और प्यार
दोस्ती एक कविता है,
एक सुंदर सी कविता,
क्योंकि इसमें शब्द अपना वो अर्थ नहीं रखते,
जो शब्द कोश में होते हैं;
शब्दों का अर्थ उनमें अन्तर्निहित
भावों से समझा जाता है,
जैसे गाली प्यार को व्यक्त करती है,
अनौपचारिकता सम्मान का प्रतीक होती है,
गुस्सा अपनापन दर्शाता है;

और प्यार,
प्यार तो अनकही कविता है,
जहाँ आँखों से ही सब कुछ कह दिया जाता है,
और समझ लिया जाता है;
जहाँ इशारों ही इशारों में,
दिल का हाल बयाँ हो जाता है;

आजकल दोस्ती तो वैसी ही है,
मगर प्यार थोड़ा बदल गया है,
जब तक बार बार व्यक्त ना किया जाय,
लिख लिख कर बताया ना जाय,
लोग प्यार का विश्वास ही नहीं करते,
मुझे समझ नहीं आता,
कि बार बार लिखकर,
या कहकर,
हम अपने प्यार की सत्यता का यकीन,
आखिर दिलाते किसको हैं,
दूसरों को,
या फिर खुद को ही।

Saturday, August 6, 2011

"मुहब्बत करना बहुत आसां है"

मुहब्बत करना बहुत आसां है
ताउम्र निभाना बहुत मुश्किल
आसां है भूल जाना किसी को
तेज आँधियो में यादो की शमां
जलाये रखना बहुत मुश्किल।

है बहुत आसां ठुकराना किसी को
अपना बनाना बहुत मुश्किल।

नहीं मुश्किल खुदा बनकर
किसी के दिल में बस जाना
मगर उस खुदा की इबादत-ओ-बन्दगी बहुत मुश्किल।

जहाँ भर को सुनाते चीखें अपनी
कांटो भरी राहो से गुज़र भी जाओगे
मगर कांटो की हर चुभन पर मुस्कुराना बहुत मुश्किल।

छोड़ दो हवाओ के सहारे लग जायेगा सफ़ीना क़िनारे
करके मुखालफत हवाओ की
लहरों को क़िनारा बनाना बहुत मुश्किल।

बने बनाये रास्तो पर चलकर मंजिल को पाना आसां है
बनकर खुद मंज़ील ज़माने को पीछे चलाना बहुत मुश्किल।

जला कर गैर का घर अपना आशीयाँ कर लिया रोशन
किसी गैर के लिये बनकर शमा जलना बहुत मुश्किल।

"Mere Chaand Meri Ik Baat Suno"

Mere Chaand Meri Ik Baat Suno

Mera Tum Bin Dil Veeran Suno

Her Subha Ki Ronak Tum Se Hai

Mere Raat K Roshan Chaand Suno

Tera Sab Se, Her Andaaz Alag

Tere Hansnay Se Ho Shaam Dhanak

Tere Bin Her Subha Shaam Suno

Mere Chaand Meri Ik Baat Suno

Ek Vaada Ker Lo Tum Mujh Se

Tum Ab Na Routho Gay Mujh Se

Ruk Jaye Na Meri Saans Suno

Mere Chaand Meri Ik Baat Suno...!!!

"Dard-e-Dill Ki Kahaani bhi"

Dard-e-Dill Ki Kahaani bhi woh Khub Likhta hai

Kahin Par Bewafa to Kahin mujhe Mehboob Likhta hai

Kuchh to Rasm-e-Wafa Nibha Raha hai Woh

Har ek Saf-e-Kahaani me Woh Mujhe Majmoo’n Likhta hai

Lafzo ki Justazu Mere sang beete Lamho se leta hai

Siyaahi Mere Ashq ko Banakar woh Har Lamha Likhta hai

Kashish Kyoun Naa ho Uski Daastaa’n-e-Dard Me yaaro

jab bhi Zikr Khud Kaa aata hai woh Khud ko Wafa likhta hai

Tahreerei’n Jhoot ki Sajaayi hai aaj Usne Apne Chehre Par

Khud Ko Dard Ki Mishaa’l aur kahin Majboor Likhta hai….

"भादों आया देख के हुई सुहानी शाम"

भादों आया देख के हुई सुहानी शाम
मौसम भी लिखने लगा पत्तों पे पैगाम।

चादर ओढ़ी सुरमई छोड़ सिंदूरी गाम
बात-बात में बढ़ गई बारिश से पहचान।

गलियारे पानी भरे आँगन भरे फुहार
सावन बरसा झूम के भादों बही बयार।

छम-छम बाजे पायली रुके नहीं बरसात
हरी मलमली चूनरी तितली चूड़ा हाथ।

बादल में मादल बजे नभ गूँजे संतूर
मन में बिच्छू-सा चुभे घर है कितनी दूर।

कच्ची पक्की मेड़ पर एक छाते का साथ
हवा मनचली खींचती पकड़-पकड़ कर हाथ।

बरसी बरखा झूम के सबके मिटे मलाल
खेतों में हलचल बढ़ी खाली हैं चौपाल।

गड़-गड़ बाजी बादरी भिगो गई दालान
खट्ठे मन मीठे हुए क्या जामुन क्या आम।

बादल की अठखेलियाँ बारिश का उत्पात
ऐसा दोनों का मिलन सूखे को दी मात।

ताल–तलैया¸ बाग़–वन, झरनों की भरमार
मन खिड़की से झाँकता हरा भरा व्यापार।

"मिजाजे-मौसम का क्या ठिकाना"

मिजाजे-मौसम का क्या ठिकाना,
जैसे तेरा होता है आना जाना।

ठहरे हैं आज अश्‍क पलकों में,
ऐ बादल, तुम कल आ जाना।

बेभाव बिकता है यहां इमान,
उसे खरीदने तुम भी आ जाना।

अंधेरा बहुत है बस्ती-ए-दिल में,
यादों के चंद चराग जला जाना।

खूब मिल तो आज रात हमसे,
क्या खबर कल है कहां जाना।

फासले दिलों के बहुत है यहां,
कभी मोहब्बत जताने आ जाना।

आंसू बहाते बेकसी के मजार में,
किसी शाम शमां जला जाना।

ईश्‍क के मौके बहुत है यहां,
कभी फुरसत में तुम आ जाना ।

"हमारे दरम्यां1 अब वो करार ना रहा"

हमारे दरम्यां1 अब वो करार ना रहा,
मजरूह2 दिलों में सुकुं-औ-करार ना रहा।

शबे-हिज्र हो के शबे-वस्ल,4 क्या करें,
तेरे होते ये दिल बेकरार ना रहा।

कुछ अश्‍कों में कुछ गजलों में उतर गया,
तेरे मुताल्लिक5 दिल में अब गुबार ना रहा।

कुछ तो हासिल होता सोहबते-ईश्‍क6 में,
तेरी चारागरी7 में अबके ऐतबार ना रहा।

दीदारे-यार8 में होती हैं ऑंखें पुरनम,
अब पहले-पहल सा दीदार ना रहा।

वही ऑंखें, वही है नशा, हो रहीं मुलाकातें,
पहली मुलाकात सा वो खुमार ना रहा।

अजीब उलझी सी रहती है हालत हमारी,
जब से उनका दर्द दिल में शुमार ना रहा।

1. बीच 2. जायल 3. वियोग की बात 4. मिलन की रात 5. तुझसे जुड़ा हुआ
6. प्रेम की संगत में 7. पथ प्रदर्शन 8. यार के दर्शन

"मुद्दतों बाद एक खत चला है मेरे नाम से"

मुद्दतों बाद एक खत चला है मेरे नाम से,
किसी ने पैगामे-ईश्‍क भेजा है मेरे नाम से।

शायद चल पड़े सिलसिला खत भेजने का,
आज पहला खत उसने भेजा है मेरे नाम से।

लिखते हैं जब वो खत चांदनी रातों में,
चांद उनके पहलू आता है मेरे नाम से।

हमें तो आरजू थी खतों के जवाब की,
सूखे गुलाब क्यूं भेजा है मेरे नाम से।

क्यूं लगा रखी है बंदिशें खत लिखने में,
खाली लिफाफा ही भेजा है मेरे नाम से।

वो मिलता नहीं शोहरतों के बाद भी,
शहर में मशहूर हुआ है मेरे नाम से।

मिल गया उसकी यादों को नया ठिकाना,
चांद पर उसका अक्स नजर आया मेरे नाम से।

"तुम समां बांधो सात रंगों का"

तुम समां बांधो सात रंगों का,
तुम्हारा भी आसमां हो सात रंगो का।

धूप की मानिंद खूब चमको,
तुम्हारा भी सूरज हो सात रंगों का।

चांद से तुम्हीं गुजारिश करना,
कभी वो भी हो सात रंगों का।

चंपा, चमेली, जूही, गेंदा औ गुलाब,
रातरानी, रजनीगंधा हो सात रंगों का।

खुदा का नूर बरसे मौसमों पर,
आज हर बादल हो सात रंगों का।

कलियों को यूं महकाओ तुम,
बहारों का आगाज हो सात रंगों का।

जहां ठिकाना हो उनकी यादों का,
दिल का वो कोना हो सात रंगों का।

कभी हम घुल जायें इनके रंगों में,
शाम का नजारा हो सात रंगों का।

"कभी बिखर जाना धूप की तरह"

कभी बिखर जाना धूप की तरह,
खूब चमक जाना धूप की तरह।

सर्द जंगलों का है ये सफर,
गर्म हवा बन जाना धूप की तरह।

आवारगी देख लेना परिंदों की,
छतों में घूम आना धूप की तरह।

सायों में पलते हैं यहां अंधेरे,
उजाला बन जाना धूप की तरह।

मेरी रात करती है इंतजार तेरा,
शाम में घुल जाना धूप की तरह।

घूम आऊं वहां, दिल चाहे जहां,
सफरे-हवा1 बन जाना धूप की तरह।

मिलते ही लिपट जाना बागों में,
दरिया-ए-खुश्‍बू2 बन जाना धूप की तरह।

"कैसी रिवायत कैसी तरविअत के जमाने आये"

कैसी रिवायत कैसी तरविअत के जमाने आये,
लोग मुकद्दस कलम से मर्सिया लिखवाने आये।

अंगारे गर चाहिए तो ले लें हमारे दिल से,
खाक जिस्म की बुझी राख क्यूं उठाने आये।

जिंदगी से ऐसी भी क्या बेरूखी हो गई,
क्यूं मौत के साथ अपना घर बसाने आये।

अच्छा लगता सिलसिला तमाम उम्र भर ,
वो तो हमें एक ही रात में रूलाने आये।

सूनी होने लगी उनकी महफिलें हमारे बगैर,
दीवानों के साथ परवाने हमें बुलाने आये।

हमे तो आदत भी हो गई महरूमियों की,
मुफलिसी को चिढ़ाने किसके खजाने आये।

डर लगता है अब अपनी तन्हाईयों से भी,
कोई उनकी भी हालते-ईश्‍क-हमें सुनाने आये।

Friday, August 5, 2011

"Jab Bhi Usko Meri Yaad"


Jab Bhi Usko Meri Yaad Aaya Karegi
Aankhon Mein Aansoon Behisaab Laya Karegi..

Jab Bhi Karegi Yaad Mere Sath Bite Har Pal Ko
Wo Ek Pal Haskar Phir Khamosh Ho Jaya Karegi..

Jab Kabhi Khud Ko Tanha Mehsus Karegi
Tab Wo Mere Likhe Khato Ko Padha Karegi..

Kitabo Mein Chhupi Meri Tasvir Dekhkar
Apne  Seene se Laga – Laga Kar Roya Karegi..

Dekh Kar Meri Di Huvi Nishani Ko
Use Apne Aanchal Mein Chhupa Liya Karegi..

Kisi Gair Ke Liye Chhorkar Mujhe Tanha
Wo Apni Bhool Pe Bahut Pachtaya Karegi...


~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~  ~ 

(¨`·.·´¨)
Smiling Always,
 `·.¸(¨`·.·´¨)
Keeps Your face
(¨`·.·´¨)¸.·´
Shining & Loving!
 `·.¸.·´

"Ishq ki maar kya karein sahib"


Ishq ki maar kya karein sahib 
Dil hai beemar kya karein sahib 

Aik laila thi aik majnoon tha 
Ab hai bharmar kya karein sahib 

Jis ne chaha usee ne loot liya 
Ham the haqdar kya karein sahib 

Unko makeup ne duplicate kiya 
Aisa singaar kya karein sahib 

Pait to bhookh se pareeshan hai 
Rang o gulnaar kya karein sahib 

Jinse hai pyaar ki umeed hamein 
Wo hein khoonkhar kya karein sahib 

Jab nahein petrol ke paise 
Moter o kaar kya karein sahib 

Jo ke SAJID adab bhi bhool gaye 
Unse guftaar kya karein sahib...!!

"Humara Ye Tum Ko Salam"


Humara Ye Tum Ko Salam Aakhri Hai
Suno Aaj Tum Se Kalaam Aakhri Hai

Tere Naam Se jo rooz piya karte they jana
Teri kasam aaj wo jaam aakhri hai

Aaj k baad na milonga buhat door chala jaonga
Tujh ko ye dena pegham aakhri hai

Chora jo mujhe to besakhta wo bool uthey
Jao ye lejao sanam hamara inaam aakhri hai

Shayad na reh paonga dunya me ab
Lag raha hai mujhe ye shaam aakhri hai..!!

Thursday, August 4, 2011

"Hawa Jab geet gati hai"

Hawa Jab geet gati hai Mere AAnsu Nhn Rukte
Tumhari Jab yaad AAti hai Mere aansu NHn Rukte
Main khush hota hun paani main baha ker kaghazi kashti
Magar jab doob jati hai mere aansu nhn rukte…


Main din bhar khauf rswai ka kitna zabt kerta hun
Magar jab raat chati hai mere aansu nhn rukte.
Kabhi jab sard shamun main mere kamre ki tanhai
Tumhain wapas bulati hai mere aansu nhn rukte…

"Flying high n high"


Flying high n high
wandering here n there
in quest of me n my happiness
went to jungles
went to hills
in quest of me and my happiness
in jungle
in between silent breeze
got a voice
heard a voice
i think its mine
i still think its mine
gone little ahead
on the banks of a sweet river
sat down n thought
how time fly
do i fly?
can i fly?
need a hand
a caring hand
a lovely hand
i think they r around
are they around?
thinking so i thought
will i fly
so i thought
wandering here n dere
i quest of me and my happiness
it is time
to fly
up n high up
and see Wat is above d sky
they are there so m i
flying high n high

"Dil yeh kahye tue paas rahey"


Dil yeh kahye tue paas rahey har dam
Dil lene ka dil dene ka hay mousam
Mere sharmile khawaboon main
Jab se hay samaya koi
Meri bholi bhali aankheen
Rahti hain khoi khoi
Palkoon pe hanse armano ki shabnam
Dil yeh kahe tue paas rahe har dam
Jab chand ki doli le kar taroon ki toli nikle
Dil machal machal kar dharke
Aur dharak dharak kar machle
Ulfat main mila hay mitha mitha gham
Dil lene ka dil dene ka hay mousam …..

Wednesday, August 3, 2011

"Ek baar jo milta hai"


Ek baar jo milta hai dubara nahi milta
Itni bari dunya main koi hamara nahi milta

Kis ko banayen apni zindagi ka hamsafar
Hum ko kahin se ishara nahi milta

Har rooz naye naye loog milte hain
Magar koi bhi jaan se piyara nahi milta

Gham k bhanwar main aise phasi hai naao
Pareshan hai is kadar k kinara nahi milta

Muddat k baad tere gali main aaye hain
Ab kis se pochen k tumhara ghar nahi milta....??

Tuesday, August 2, 2011

Meri zindagi kisi aur ki

Meri zindagi kisi aur ki, mere naam ka koi aur hai,
Mera aks hai sar-e-aaina, pase aayina koi aur hai,
Meri zindagi kisi aur ki mere naam ka koi aur hai..

Meri dhadkanon mein hai chaap si, ye judai bhi hai milap si,
Mujhe kya pata, mere dil bata, mere saath kya koi aur hai,
Meri zindagi kisi aur ki mere naam ka koi aur hai..

Na gaye dinon ko khabar meri, na shareeke haal nazar teri,
Tere desh mein, mere bhesh mein, koi aur tha, koi aur hai,
Meri zindagi kisi aur ki mere naam ka koi aur hai..

Wo meri taraf nigraan rahe, mera dhyaan jaane kahan rahe,
Meri aankh mein kai sooraten -2 mujhe chahta koi aur hai,
Meri zindagi kisi aur ki mere naam ka koi aur hai..

Mera aks hai sar-e-aaina, pase aayina koi aur hai,
Meri zindagi kisi aur ki mere naam ka koi aur hai..

paida koi raahi koi rahbar nahin hota

paida koi raahi koi rahbar nahin hota
be husn-e-amal koi bhi badter nahin hota.

sach bolte rahne ki jo aadat nahin hoti
is tarah se zakhim te mera sar nahin hota.

kuch waraf to hai dimagon dilon mein
yun hi koi sukrat v sikandar nahin hota.

dushman ko dua de ke ye duniya ko bata do
bahar kabhi aape se samundar nahin hota.

wah shakhsh jo khushbu hai wah mahkega abad tak
wah kaid maho saal ke andar nahin hota.

un khanabadoshon ka watan sara jahan hai
jin khanabadoshon ka koi ghar nahin hota.

JAB BHI IS SHAHAR MEIN

JAB BHI IS SHAHAR MEIN KAMARE SE MAIN BAHAR NIKLA
MERE SWAGAT KO HAREK JEB SE KHANJAR NIKLA

TITLIYON-FULON KA LAGTA THA JAHAN PAR MELA
PYAAR KA GAON WO BAARUD KA DAFTAR NIKLA

DUB KAR JISMEIN UBAR PAYA N MAIN JIVAN BHAR
EK AANSOO KA WO KATARA TO SAMUNDAR NIKLA

MERE HOTHON PAR DUA,USKI JUBAAN PAR GAALI
JISKE ANDAR JO CHHIPA THA WAHI BAHAR NAIKLA

JINDAGI BHAR MAIN JISE DEKH KAR ITRATA RAHA
MERA SAB RUP WO MITTI KI DHAROHAR NIKLA

KYAA AJAB CHHIJ HAI INSAAN KA DIL BHI"NEERAJ"
MOM NIKLA YE KABHI TO PATTHAR NIKLA..!!

Har khushi Hai

Har khushi Hai Logon Ke Daman Mein,
Par Ek Hansi Ke Liye Waqt Nahi.
Din Raat Daudti Duniya Mein,
Zindagi Ke Liye Hi Waqt Nahi.

Maa Ki Loree Ka Ehsaas To Hai,
Par Maa Ko Maa Kehne Ka Waqt Nahi.
Saare Rishton Ko To Hum Maar Chuke,
Ab Unhe Dafnane Ka Bhi Waqt Nahi.

Saare Naam Mobile Mein Hain,
Par Dosti Ke Lye Waqt Nahi.
Gairon Ki Kya Baat Karen,
Jab Apno Ke Liye Hi Waqt Nahi.

Aankhon Me Hai Neend Badee,
Par Sone Ka Waqt Nahi.
Dil Hai Ghamon Se Bhara Hua,
Par Rone Ka Bhi Waqt Nahi.

Paison ki Daud Me Aise Daude,
Ki Thakne ka Bhi Waqt Nahi.
Paraye Ehsason Ki Kya Kadr Karein,
Jab Apane Sapno Ke Liye Hi Waqt Nahi.

Tu Hi Bata E Zindagi,
Iss Zindagi Ka Kya Hoga,
Ki Har Pal Marne Walon Ko,
Jeene Ke Liye Bhi Waqt Nahi......

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर

कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें
आये हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें

यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र
सर पर ख़याल-ए-यार की चादर ही ले चलें

रंज-ए-सफ़र की कोई निशानी तो पास हो
थोड़ी सी ख़ाक-ए-कूचा-ए-दिलबर ही ले चलें

ये कह के छेड़ती है हमें दिलगिरफ़्तगी
घबरा गये हैं आप तो बाहर ही ले चलें

इस शहर-ए-बेचराग़ में जायेगी तू कहाँ
आ ऐ शब-ए-फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें

===== जनाब नासिर काजमी =====

अभी सूरज नहीं डूबा

अभी सूरज नहीं डूबा, ज़रा सी शाम होने तो दो,
मैं खुद ही लोट जाऊँगा, मुझे नाकाम तो होने दो..

मुझे बदनाम करने के, बहाने ढूँढ़ते हो क्यूँ ?
मैं खुद हो जाऊँगा बदनाम, पहले नाम तो होने दो..

अभी मुझको नहीं करना है, एतराफ-ए-शिकस्त,
मैं सब तस्लीम कर लूँगा, ये चर्चा आम होने तो दो....