Saturday, January 21, 2012

हे जनता तुम्हें अब बस चुप रहना है
हम जो सितम ढाये तुमको सहना है
तुम्ही ने तो हमे ये राज पाट सौंपा है
अक्सर चुनावो में भारत हम पर थोपा है

हमने इतना भरमाया तुम को अपनी चालों से
क्या तुम समझ नही पाये कुछ इतने सालों से
हर पल तुमको उलझाया है हमने अपने नारो से
अमीर गरीब का भेद बढ़ाया अपने झूठे वादो से


आजादी से अब तक हमने बस खानदान को चुना है
नेहरू इन्दिरा, राजीव सोनिया का ताना बाना बुना है
राहुल प्रियंका को अभी बस थोड़ा सा इंतजार करना है
तब तक हमें बस आपको कुछ और बेवकूफ बनाना है

प्रश्न कोई हो हमने तो बस गुजरात सबको दिखाया है
1984 के दंगो को स्वाभिमान हमने अपना बनाया है
सत्ता जब अपनी हो तो कोटरोची को हमने बचाया है
भोपाल गैस कांड के दोषी को देश से हमने भगाया है

प्रमुख विपक्ष को हमने हरदम भगवा रंग मे झौका है
इस नीति के कारण हमे मिल जाता हर बार मौका है
अल्पसंख्यंक का पत्ता खेला है विपक्ष को सत्ता से रोका है
विपक्ष अगर भूल भी जाये तो अयौध्या को खूब सेका है

हमने अपनी चालों से देश में ‘तहलका’ खूब मचाया है
यूँ विपक्ष को स्टिंग मे घेर, उनको हमने चुप कराया है
2-जी और कामनवेल्थ खेलों से हमने लिया फायदा है
अफजल-कसाब को कुछ न होने देंगे ये हमारा वायदा है

कालाबाजारियों से अपना कमीशन बांध लिया है
अपना पैसा हमने स्विस बंकों मे जमा किया है
भ्रष्टाचार को तो हम सबने आज अपना लिया है
कोई कुछ कहे हमने तो अब खूब कमा लिया है

अन्ना रामदेव की मांगो को आज ठेंगा दिखाया है
लोकपाल या भ्रष्टाचार के मुद्दे को हमने भुलाया है
बाबा के समर्थको को तो डंडों का कहर दिखाया है
तैयार रहना, अभी असली रूप आपको दिखाना है

राजनीति के रंग निराले भैया
चलते हैं तीर और भाले भैया

बिन पेंदी के लोटा हैं सब
रोज ही बदले पाले भैया

फितरत की क्या बात करें हम
दिल के हैं सब काले भैया

सुबह शाम उड़ायें छप्पन भोग ये
जनता के लिए महँगी है दालें भैया

चुनाव भर घुमे ये घर-घर पैदल
कार में भी मंत्रीजी को आये छाले भैया

करते हैं सपरिवार विदेश में शॉपिंग
आमजन को है खाने के लाले भैया

संसद को बना दे ये आरोपों का अखाड़ा
विकास की बात पे जुबां पे लगे ताले भैया

रहती है इन्हें बस कुर्सी की ही चिंता
कुर्सी के लिए देश को भी बेच डाले भैया

बोफोर्स, चारा, टेलीकॉम, हवाला
इनके हैं बड़े-बड़े घोटाले भैया

राजनीति के रंग निराले भैया
दिल के हैं सब काले भैया

Wednesday, January 18, 2012

गंगा-स्नान ...
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एक दिन मैंने भी सोचा
क्यों न - मैं भी गंगा-स्नान करूँ !
इसलिए,
ब्रह्ममुहूर्त में पहुँच गया, मैं सीधे गंगा तट पे !
पर
वहां, भीड़ देख चंडालों की, मैं थोड़ा-सा सहम गया !

सारे तट पर -
डुबक-डुबक ... भीड़ बड़ी थी, चोरों और चंडालों की !
भीड़ देख कर मैंने सोचा -
नहीं, अभी नहीं वो घड़ी है आई
कि -
मैं गंगा-स्नान करूँ !!

आज, यहाँ पर, पाप-पुण्य की बेला है
न जाने किसको, क्या मिलना - क्या देना है
चहूँ ओर ... डुबक-डुबक ...
देखेंगे, फिर देखेंगे, फिर किसी दिन देखेंगे !
आज नहीं वो बेला है
सच ! आज, गंगा-स्नान झमेला है !!
मैं जिंदा हूँ 
अन्याय का खिलाफत मैं कर नहीं पाता
कुशासन-सुशासन का फर्क समझ नहीं पाता 
प्रदूषित हवा में सांस लेता हूँ 
पर मैं जिंदा हूँ 

सरकारी तंत्र से शोषित हूँ मैं
बिना सबूत आरोपित हूँ मैं
खुद को साबित मैं कर नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ

दिल से चीत्कार उठती है
मन में हाहाकार मचती है
होंठों से कोई शब्द निकल नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ

रक्त में उबाल अब भी है
भावनाओं में अंगार अब भी है
बस विद्रोह के स्वर गा नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ

क्यों डरता हूँ इस झूठे तंत्र से
काश मन जागृत हो कोई मन्त्र से
नष्ट कर दूं उन कुकर्मियों का ,
एक भीड़ मैं जुटा नहीं पाता
पर मैं जिंदा हूँ
सपनो का दर्पण देखा था
सपनो का दर्पण तोड़ दिया 
ये प्यार का दामन हमने तो 
आंचल से तुम्हारे जोड़ लिया
ये ऐसी गांठ है उल्फत की
जिसको न कोई भी खोल सका
तुम आन बसे जब इस दिल में
दिल फिर तो कही ना डोल सका
ओ प्यार के सागर हम तेरी
लहरों में नाम डुबो बैठे
तुम पढ़ ना सके ख़ामोशी को
और हम आवाज को खो बैठे
ज़िन्दगी की भाग दौड मे
हर पल यों गुजर रहा है
‘मरने से पहले तू जी ले’
किसने ये क्या खूब कहा है

हंसीन लम्हें है कुछ थोडे
कितना दुख तूने सहा है
साथ चलेंगे साथ रहेंगे
मै वही हूं तू जहां जहां है

कोई चाहेगा क्या किस को
जितना मैने तुम्हें चाहा है
दयार जो मिरा का मंदिर मे
तेरी जगह दिल मे वहां है
वक़्त का मुझे कोई होश नही
जिस्म मे मेरे कोई जोश नही
तरसाते हो तुम तनहाई मे
और कहते हो ‘मेरा कोई दोष नही’

एक अंजाना सा आघोश कही
तो हलका सा सरगोश कही
सुनाई आती है आवाज तेरी
चुप रहो या रहो दूर खामोश कही

जमाने का मुझ पे रोष सही
पहचान मेरी फरामोश सही
हो जिम्मेदार तुम ही मेरे
खुद को मान लो चाहे निर्दोश सही

Tuesday, January 17, 2012


उन्हे शौक बदनाम करनेका है
हमे शौक बदनाम होनेका है
 
न मिलना,न चिठ्ठी,नही जिक्र भी
इरादा हमे अब भुलानेका है

 
पलटके जो देखा पशेमॉं है वो
नया खेल नजरे चुरानेका है 
 
घटासे वो बरसे,हवाओमें बोले
बहाना हमे ये सतानेका है

 
खुशीका है भूली वो इजहार भी
ये अंदाज गर मुस्कुरानेका है
 
कभी अक्स देखे तो हस लेते है
हमीसे हमे गम छुपानेका है

 
लिपट जाती है भीगी बेलासी वो
यही लुफ़्त उनको मनानेका है
 
कभी दूरिया भी हो हममें सनम
समय वो दिलोंको परखनेका है
  
न मुझको पता है,न तुमको खबर”
’है कुछ बात’...कहना जमानेका है
 
मुझे जानना ना है मुमकिन तुम्हे
ये चेहरा मेरा बस दिखानेका है

संसद के दरवाजो से चीत्कार सुनाई देती है
कुछ खोटे पापी सिक्को की अब हार सुनाई
देती है,
मेरा जन-गन वाला भारत
भूखा प्यासा बैठा है,
सविधान का रखवाला कुर्सी पर
बैठा एठा है
कोई तिरंगा चीर रहा है सरे आम
बाजारों में,
कोई मसीहा पूज रहा है एटम बम
हथियारों में,
कोई कोई मेरे देश का सौदा करने लगता है,
कोई विदेशी मुद्रा अपने मठ में भरने
लगता है,
कोई भारतवासी अपने घर में भूखा सोता है,
रोटी एक कमा के लाता बच्चा खाके
सोता है
कोई कुछ कुछ मिला रहा है नमक दाल और
शक्कर में
कोई सोनावाड़े जला है माफ़िआओ के चक्कर
में
कोई विधवा के
फ्लैटों को अपना कहना लगता है,
कोई मवाली हत्यारा संसद में रहने
लगता है
कोई खबरे भेज रहा है गैर पडोसी देशो में,
कोई जीवन दूढ़ रहा है बचे हुए अवशेषों में
कोई उची कुर्सी वाला हाथ जोड़ रह
जाता है
और करोडो का घोटाला ए-राजा कर
जाता है
काला धन मेरे भारत
का पड़ा विदेशी मुल्को में
जासूस खबरे बेच रहा है नाम मात्र के
शुल्को में
कही जले है लाखो गाँधी सच्चाई के कारण
जी
जन गन मन का नहीं करपाते नेता कुछ
उच्चारण जी
देश प्रेम का ढोंग घिनोना ढोंगी मोह
को देखो जी
बापू जी की पुन्य तिथि पर फैशन
शो को देखो जी
मैंने तो हरदम कोसा है भ्रस्टाचारी ताकत
को जी
मै गद्दारी कहता महगाई और मिलावट को
कोई नेता नाचे नंगा नेहरु वाली धरती पे
कोई ताली पीट रहा है भारत देश
की अर्थी पे
कोई ठुमके लगा रहा है फैशन वाले रैम्पो पर
कोई किडनी चुरा रहा है मुफ्त
चिक्तिसा कैम्पों पर
सोने की चिड़िया का हिंद आवाज
लगता सुन लो जी
दीन हीन अध् मारा पड़ा फ़रियाद
सुनाता सुन लो जी
मुझको तो केवल लूटा है सत्ताधारी ताकत
ने
और सुंहागा लगा दिया है हिंसा लूट
मिलावट ने
शब्दों में जो बध न पाये ऐसी मेरी हालत है
डूब मरो ए गद्दारों ये गाँधी वाला भारत
है
ऊँगली उठाना घाव कुरेदना यही लक्ष्य
नहीं मेरा जी
भारत देश लुटेरो का ही नहीं सिर्फ एक
डेरा जी
यहाँ अब भी बचे हुए है गाँधी के विचार जी
इधर उधर बिखर रहे गाँधी के विचार जी
विश्वास नहीं टूटा अब तिलक घोख्ले
बुद्धो पर
देश भक्त अब सोच रहे है नवनीति के
मुद्दों पर
हम भी आये तुम भी आओ करने सोच विचार
जी
भ्रस्टाचारी पापिओ का करदे का तमाम
जी
रोके मिलावट खोरी चीजो की चोर
बाजारी को
उत्पादन खूब बढ़ा के अपना भूले हम
लाचारी को
संसार शिरोमणि था ये देश फिर से बने
महान जी
मेरा भारत प्यारा भारत जाए न
इसकी शान जी
मेरा भारत प्यारा भारत जाए न
इसकी शान जी
बुढ़ापे में जो हो जाए उसे हम प्यार कहते हैं,
जवानी की मुहब्बत को फ़कत व्यापार कहते हैं।
जो सस्ती है, मिले हर ओर, उसका नाम महंगाई,
न महंगाई मिटा पाए, उसे सरकार कहते हैं।

... जो पहुंचे बाद चिट्ठी के उसे हम तार कहते हैं,
जो मारे डॉक्टर को हम उसे बीमार कहते हैं।
जो धक्का खाके चलती है उसे हम कार मानेंगे,
न धक्के से भी जो चलती उसे सरकार कहते हैं।

कमर में जो लटकती है, उसे सलवार कहते हैं,
जो आपस में खटकती है, उसे तलवार कहते हैं।
उजाले में मटकती है, उसे हम तारिका कहते,
अंधेरे में भटकती जो, उसे सरकार कहते हैं।

मिले जो रोज बीवी से, उसे फटकार कहते हैं,
जिसे जोरू नहीं डांटे, उसे धिक्कार कहते हैं।
मगर फटकार से, धिक्कार से भी जो नहीं समझे,
उसे मक्कार कहते हैं, उसे सरकार कहते हैं।

सुबह उठते ही बिस्तर से 'कहां अखबार' कहते हैं,
शकल पर तीन बजते 'चाय की दरकार' कहते हैं।
वे कहती हैं, 'चलो बाजार' हंसकर शाम के टाइम,
तो हम नज़रें झुकाकर 'मर गए सरकार' कहते हैं।
मैंने अपनी जिंदिगी में औरतों की पीड़ा और दर्द की पराकाष्ठा को देखा हैं , उसे कभी भी हालात से हारते नहीं देखा इसलिए आज की पैसे और प्रसिद्धि के लिए उसका भटकाव समझ नहीं आता . कविता और कहानी मन के नीजी भाव होते हैं , प्रार्थना और क्षमा के साथ इसे प्रस्तुत कर रही हूँ , कोई अन्यथा न लें . ”

तू चंडी ,तू दुर्गा ,तू काली ,
तू सृष्टि को रचने वाली हैं
कहाँ हैं तेरे अस्त्र -शस्त्र,,,?
कहाँ तू उसे भूल आई हैं ?
जिसको तूने जनम दिया ,
भला उससे क्यों घबराई हैं
कौन सी बेखुदी ,कौन सा नशा
कि लज्जा ही भूल आई हैं ,,,,,
रति का ये कैसा रूप हैं अपनाया ?
मतभूल तू ही सती,सीता ,सावित्री हैं ,
दुःख और दर्द तेरी ताकत हैं नारी ,
नारी तू दर्द ,दर्द तेरा हमसाया हैं ,
तू ….सबला ……..तू ….सक्षम .
फिर मन को क्यों भरमाया हैं ?
तेरी अस्मिता पर उठे सवाल ,
ऐसा वक़्त ही क्यों आया हैं ?
पीड़ा सहकर ही तू जननी बनी ,
तभी तो सबने कहा ,तू धरा हैं .
मत भूल इसी धरती पर ,
अंबर का अस्तित्वा खड़ा हैं ,
वरना कौन शून्य को निहारता ?
हर किसी ने कदम ,तुझपे ही टिकाया हैं

स्वयं को पहचान,बदल अपनी किस्मत ,
कोई क्या लिखे तुझपे ,किसकी इतनी हिम्मत ?
किसमे इतना दम कि तेरी तक़दीर बदल सके ,
हैं वो तूं ,कि इतिहास कि तारीख बदल दे ,
हे ,,,,शक्तिरूपा ,अपनी शक्ति को पहचान ,
खुद तेरे ही हाथों हैं ,,तेरा मान और सम्मान .
मै सपने क्यों देखूँ?

जब यथार्थ सपनों सा हो,
और साथ मेरे अपनॊं का हो ।
मीठा मीठा दर्द मिल जाए जब यूँ ।

मै सपने क्यों देखूँ?

रातों की प्यारी सर्द हवायें
जब मेरे तन-मन को छू जायें ।
क्यों न एकटक मैं चाँद को लेखूँ ।

मै सपने क्यों देखूँ?

प्रात-किरण खिड़की से आकर,
गीत कोई जागृति का गाकर
पूछे, "राजकुमार क्यों सोया है " तू?"

मै सपने क्यों देखूँ?
बचपन का जमाना
बचपन का जमाना होता था
खुशियों का खजाना होता था,
चाहत चाँद को पाने की 
दिल तितली का दीवाना होता था,

खबर न थी कुछ सुबह की
न शामों का ठिकाना होता था,
थक-हार के आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना होता था,

दादी की कहानी होती थीं
परियों का फसाना होता था,
बारिश में कागज की कसती थी
हर मौसम सुहाना होता था,

हर खेल में साथी होते थे
हर रिश्ता निभाना होता था,
पापा की वो डांटें गलती पर
माँ का मनाना होता था,

कैरियर की टेंशन न होती थी
ना ऑफिस को जाना होता था,
रोने की वजह ना होती थी
ना हंसने का बहाना होता था,

अब नहीं रही वो जिन्दगी
जैसा बचपन का जमाना होता था
इस भारत देश महान का 
क्या होगा हिन्दुस्तान का 

धर्म गुलाम बना रखा है धर्म के ठेकेदारों ने 
जात पात का भेद छुपा है राजनीती के नारों में 
चीर हरण होते देखे है हमने बीच बाजारों में
रोज नए घोटाले यारो पढ़ते है अखबारों में

ढंग बदला है इंसान का
क्या होगा हिन्दुस्तान का

धन की देवी लक्ष्मी के चेहरे पे कालिख पोती है
बंध विदेशी तालो में अपने लालो को रोती है
जागा है शैतान, देवी सविधान की सोती है
करता है इन्तेजार जमाना प्रलय कैसी होती है

रहे धोखा अपनी जान का
क्या होगा हिन्दुस्तान का

रिश्वत का है दौर- ए- जमाना हर कोई रिश्वत लेता है
कोई छोटी रिश्वत लेता है कोई मोती रिश्वत लेता है
जब कोई रिश्वत देता है तो हर कोई रिश्वत लेता है
क्यों रोता है रिश्वत को जब तू ही रिश्वत देता है

सब चक्कर जान पहचान का
क्या होगा हिन्दुस्तान का

देश तभी सुधरेगा पहले बदलो अपने आप को
दंश तो पक्का मारेगा क्यों दूध पिलाते साप को
कोई दुश्मन टिक पाए ना बदलो जरा अलाप को
आतंकवाद का नाश करेंगे बोल दो उसके बाप को

जो काटे शीश शैतान का
वो होगा हिन्दुस्तान का
बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ
पावों के नीचे अंगारे
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ
निज हाथों में हँसते-हँसते
आग लगाकर जलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा

हास्य-रुदन में, तूफानों में
अगर असंख्यक बलिदानों में
उद्यानों में, वीरानों में
अपमानों में, सम्मानों में
उन्नत मस्तक, उभरा सीना
पीड़ाओं में पलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा

उजियारे में, अंधकार में
कल कहार में, बीच धार में
घोर घृणा में, पूत प्यार में
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में
जीवन के शत-शत आकर्षक
अरमानों को ढलना होगा
कदम मिलाकर चलना होगा

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ
असफल, सफल समान मनोरथ
सब कुछ देकर कुछ न माँगते
पावस बनकर ढ़लना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।
अरमानो की बस्ती बसाकर तो जाते
अपने दिल की आवाज़ सुनाकर तो जाते

अंधेरो की बस्ती में बसर है मेरा
रौशनी का चिराग जलाकर तो जाते

हम ही नादान थे जो रूठे तुमसे
जाते जाते हमें मनाकर तो जाते

मिलन की आस में गुज़ार दी रात हमने
गर जाना ही था तो सुलाकर तो जाते

कह लेते हम भी हाल-ऐ-दिल अपना
कुछ वक़्त साथ बिताकर तो जाते

मिल जाती हमें भी वो असीम दौलत
कुछ देर सीने से लगाकर तो जाते

ज़र्रे ज़र्रे में ढूँढा है तुम्हे
अपने मिलने की राह बताकर तो जाते

Monday, January 16, 2012

बस बे-सबब यूँ ही फिरा करना 
हमे भी नहीं है पता क्या करना 

हवा तेज़ है कुछ तूफ़ान भी है 
चरागों की हक में दुआ करना 

हमसे ना सही औरों से ही सही
पर यूँ किसी से तो वफ़ा करना

देना नाम उसे ग़ज़ल का मगर
लफ़्ज़ों में उसको लिखा करना

दर्द समझोगे तब ही तुम मेरा
मेरे जैसे कभी तो हुआ करना

बस अपनों में शुमार कर लेते
कब कहा बन्दे को खुदा करना

घुटन भरी है जिन्दगी अपनी
कुछ इधर बाद-ए-सबा करना

तहरीर-ए-लब से हंसी लिखना
अश्क आँखों से ना जुदा करना 
होते हैं प्यार के अनेक रूप 
तुम पढ़ती हो मेरी कविता 
इसी वजह से 
मैं रहता हूँ अब खुश 
तुम ही वह शीतल प्रतिछाया हो 
... जिसे ओढ़ मैं जीता
चाहे कितनी भी हो कड़ी धूप
तुम्हारे मन कों ही पढ़ता हूँ
तुम्हारे सौन्दर्य पर ही लिखता हूँ
तुम्हें मुझसे न प्रेम हैं न नफरत
मेरे प्रति तटस्थ पारदर्शी इस भावाना से
मैं हूँ अभिभूत
सौप दिया हैं स्वयं कों
तुमने मुझे
कल्पनाओं में चित्रित करने की
देकर छूट
भरसक कोशिश करता हूँ
काव्य सृजन हो
तुम्हारी मनमोहक
छवियों के अनुरूप
तुम मेरी कल्पना से भी ज्यादा सुंदर हो
आलोकित कर जाता हैं मुझे
तुम्हारी रूह का नूर
तुम स्नेह की लहर हो
कभी पास आती हो
और
कभी चली जाती हो मुझसे दूर
तुममे साकार ,निराकार
दोनों आकार समाये
मुक्त होकर आकाश में बादलों सा
बिखर कर
हो गयी हो तुम उन्मुक्त
कही ऐसा न हो की
मेरे द्वारा सम्पूर्णत: अनउल्लेखित
रह जाए तुम्हारे व्यक्तित्व का
यह व्यापक स्वरूप 
वो मुझको जब ख़त लिखती है 
दिल की हर हसरत लिखती है 
नींद से बोझिल आँखे उसकी 
तनहा-दिल और फुर्कत लिखती है....वो मुझको जब ख़त लिखती है

मुझको तो सब गैर लगे है
सावन रुत से बैर लगे हैं
कोई न मौसम अपना सा है
कब होगी अब कुर्बत लिखती है....वो मुझको जब ख़त लिखती है

मुझमे न अब मैं रहती हूँ
हर शय में तुमको तकती हूँ
मरने से पहले आ जाना
मिल जाए गर फुर्सत लिखती है....वो मुझको जब ख़त लिखती है

कितना और सताओगे तुम
कब मिलने को आओगे तुम
अपना मुझे बनाओगे क्या
होगी कब ये रहमत लिखती है....वो मुझको जब ख़त लिखती है 
सन्नाटों में शोर उतर आया होगा जब 
बाद मुददतों कोई घर आया होगा जब 

रौशनी ने कुछ दम भर साँस ली होगी 
चराग आंधी से गुजर आया होगा जब 

उसने कीमत में जिंदगी लगा दी होगी
इश्क में वो सौदा कर आया होगा जब

माँ के आँचल की छाँव याद आती होगी
गाँव छोड़कर के शहर आया होगा जब

लफ्ज़ सफहों पे नमी लेकर उतरे होंगे
के अब्र यादों का इधर आया होगा जब

हर आहट उसकी आमद लगती होगी
नींद में उसका असर आया होगा जब

चंद क़दमों के फासले मीलों लगे होंगे
कोई तन्हा सा सफ़र आया होगा जब 
जीत की बातें हैं, ना हैं हार की बातें 
इश्क में हैं तो दर्द बेशुमार की बातें 

वो मौसमों के हसीं निखार की बातें 
रह गयीं हैं अब कहाँ बहार की बातें 

वीराने घर के और ये दीवार-ओ-दर
आज भी करते हैं इंतज़ार की बातें

अपना बना के जबसे छोड़ गया वो
लगती हैं बेजा सी ऐतबार की बातें

शाम तन्हाई जो उसकी याद चले है
आँखें करती हैं फिर फुहार की बातें

ख्यालों की वादी का 'राज़' ग़ज़ल में
चनाब की बातें कुछ चनार की बातें 
कुछ और नहीं, है ये इनायत इश्क के बुखार की 
के सभी कुछ हो मगर, जाए ना जान बीमार की 

मुहल्ले की हर खबर तो इन लुगाईयों के पास है 
क्या जरुरत रह जाए है फिर घर में अखबार की 

उसको भी शौक नहीं है अपना गाँव छोड़ देने का
शहर में खींच लाती है बस ये वजह रोजगार की

आज-कल तो चापलूसों का ही ज़माना रह गया
कद्र ही कहाँ रह गयी है अब अच्छे फनकार की

बुतों को पूजने वाले और नमाज़ी भी जानते हैं
खुदा भी ना ले सकेगा जगह माँ के किरदार की

सब मिलता है बाज़ार में बस यही नहीं मिलती
दुआएं लेने की औकात नहीं किसी खरीददार की

मेरे लफ़्ज़ों की गहराइयों तक उतरे कौन भला
सबको बातें मेरी लगती हैं बस यूँ ही बेकार की 
न तुम, मेरे करीब आ सकी 
न मै, तुमसे दूर जा सका 
उम्र बीतती रही ऐसे ही ख्यालो में 
कभी तुम कुछ नहीं बोले 
कभी हमसे कुछ बोला न गया 

कभी तुम मुझसे छुपाते गए
कभी मुझसे दिखावा न हुआ
न जाने वो कैसा रास्ता था
जिसपे कभी तुम नहीं चले
और कभी मुझसे अकेले आया न गया

तुम रहे इक आजाद पंछी
मै इक बंधा ''शिकारा''
तुमने रुकना मुनासिब नहीं समझा
कभी मुझसे तुम्हे रोका न गया

तुम्हे नए रिश्ते बनाने का शौक
हमे पुराने बंधन प्यारे
तुमसे कभी बंधन में बंधा न गया
हमसे नया रिश्ता बनाया न गया 
हमारे सर पे भी एक आसमान रहता है 
दुआओं सा जो कोई निगहेबान रहता है 

तुम नमाज़ी हो तो क्या समझोगे कभी 
खुदा काफिरों पे कहाँ मेहरबान रहता है 

इस तन्हा शब् को जिसकी याद आती है
सहर की नमी में उसका निशान रहता है

उसके आँचल की छाँव ना हो जब तलक
घर, घर नहीं बनता बस मकान रहता है

बिछड़कर के मरते तो नहीं हैं हम दोनों
हाँ, बस जिन्दा रहने का गुमान रहता है

कुछ और नहीं है ये एहतियातों के सिवा
जो फासला दोनों के दरमियान रहता है 
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर

हैं कौन किसी के. साथ खड़ा
हा, समय का ये अन्याय बड़ा
ये मित्र तो शोभित दिन के हैं
जब साँझ हुई ,तब जान पड़ा

कल तक जो साथ मैं थे मेरे
निशदिन थे ,, चार प्रहर घेरे
पर अब विरक्त, वो मुझसे हैं
क्या अजब समय के हैं फेरे

कितनों परथा विश्वास किया
ओरों का विष भी स्वयं पिया
जब चोट लगी तब भान हुआ
व्यर्थ ही सब कुछ दिया लिया

ये साथ तेरा भी का क्या देंगे
सब दोष ही तुझ पर धर देंगे
सेकेंगे आग.. लगा के स्वयम
और साँस न तब तक ये लेंगे

हे मित्र ये जग की रीत नयी
जब रात गयी सब बीत गयी
सब चेहरे हैं... हलकान यहाँ
और चेहरों पे.... चहरे हैं कई

ये देश हैं... मक्खन बाजों का
इन्के अभिशिप्त रिवाजों का
ओकात तेरी क्या कुछ कहदे
सिक्का हैं धान्धले बाजों का

तुम कौन विषय के साधक हो
तुम कौन..... देव आराधक हो
क्यों इतर तुम्हारा, दृष्टि कोण
क्यों भाव सृजन मैं बाधक हो

पर शक्ति नहीं ,अब लड़ पाऊँ
एकल प्रयास मैं....भिड़ पाऊँ
कोई तो साथ नहीं ..पग भर
अब क्षमता नहींकी अड़ जाऊं

फिर क्यों मैं तुम्हारी आस करूं
फिर क्यों तुमपे, विश्वास धरूं
तुम कौन सखा बचपन के मेरे
क्या पड़ी तुम्हे किस ठौर मरूं

अब साल की अंतिम बेला हैं
नववर्ष का अद्भुत.... मेला हैं
हो जश्न रहा चहु और.. मगर
मन चातक निपट अकेला हैं

तो आओ चलो इतना कर लो
जो रूठे हैं उनको.. उर भर लो
क्या रोष करे जब दिन कम हैं
सब राग द्वेष हिय से हर लो
हँस रहे हो तुम मगर उदास क्यों,
वेगवान इस नदी में प्यास क्यों,
रात में न जाग आँख बंद कर,
दर्द भी कभी कभी पसंद कर,
तिलमिलाहटों को रख परे जरा,
मुस्कुराहटों की हद बुलन्द कर,
भूल जा जखम मिले तुझे कभी,
दो युगों के बाद न्याय आस क्यों,
हँस रहे हो तुम मगर उदास क्यों,
वेगवान इस नदी में प्यास क्यों |

लाख कर जतन मगर मिले नहीं,
जिंदगी मिले अमन मिले नहीं,
युद्ध की विभीषिका मनन में है,
रक्त आज मेरे आचमन में है,
प्राण तज रहें है शूरवीर अब,
खून की है इस धरा को प्यास क्यों,
हँस रहे हो तुम मगर उदास क्यों,
वेगवान इस नदी में प्यास क्यों |

मन मचल रहा था जाने क्यों,

मन मचल रहा था जाने क्यों,
इस बार जुदाई होनी थी,
तुमको आना था जीवन में,
अब नींद पराई होनी थी |

तुम रूपवती तो हो लेकिन,
मन की सुंदरता मोह गयी,
जब नयन मिले तुमसे उस क्षण,
पथ आत्म-चेतना छोड़ गयी,
तुम समझ गयी अब तो मेरी,
घर-बार बुराई होनी थी,
तुमको आना था जीवन में,
अब नींद पराई होनी थी |

तन पुलकित होना भूल गया,
मन हर्षित ना हो पाया था,
तुमको सम्मुख पाकर भटका,
मन राह नहीं फिर पाया था,
मै जान गया तुझको पाकर,
अब खूब हँसाई होनी थी,
तुमको आना था जीवन में,
अब नींद पराई होनी थी |

आज भी विरूद्ध आसमान है,

आज भी विरूद्ध आसमान है,
न्याय का यही नया विधान है,

काटते रहो वही किया नहीं,
जो किया सही कभी हुआ नहीं,

प्रश्न उठ रहे हरेक ओर से,
उत्तरों से शून्य ये जहान है,

आज भी विरूद्ध आसमान है,
न्याय का यही नया विधान है |

इन्तजार कब तलक किया करें,
बार बार मर के हम जिया करें,

कौन रच रहा है आज साजिशें,
मरने पे कौन आज जान है,

आज भी विरूद्ध आसमान है,
न्याय का यही नया विधान है |

क्या कहूँ तुमसे के मैं ये जिंदगानी खूब है

क्या कहूँ तुमसे के मैं ये जिंदगानी खूब है 
लब तो मेरे हंस रहे आँखों में पानी खूब है 

ना मिला रहबर कोई ना ही मिला रहनुमा 
तन्हा तन्हा लिख रहा हूँ ये कहानी खूब है 

क्या करूँ आँखों में हैं जबसे आकर वो बसे
आईना तक कहता है के तू दीवानी खूब है

उनका ज़माल देखूं के उनसे मैं बातें करूँ
सामने पाकर उन्हें हो रही हैरानी खूब है

कुछ शामें इंतज़ार की कुछ ख्वाब की रातें
इश्क में जो है मिली इक-2 निशानी खूब है 

कबूतर छल रहा है

कबूतर छल रहा है
बवंडर पल रहा है ।१।

वही है शोर करता
जो सूखा नल रहा है ।२।

मैं लाया आइना क्यूँ
ये उसको खल रहा है ।३।

दिया ही तो जलाया
महल क्यूँ गल रहा है ।४।

छुवन वो प्रेम की भी
अभी तक मल रहा है ।५।

डरा बच्चों को ही अब
बड़ों का बल रहा है ।६।

वो मेरे स्नेह से ही
मेरा दिल तल रहा है ।७।

छुआ जिसको खुदा ने
वही घर जल रहा है ।८।

दहाड़े जा रहा वो
जो गीदड़ कल रहा है ।९।

जिसे सींचा लहू से
वही खा फल रहा है ।१०।

उगा तो जल चढ़ाया
अगिन दो ढल रहा है ।११।

सज्जन सारे परेशान

सज्जन सारे परेशान
मजे में लुच्छे-लफंगे हैं

मजदूर, किसान, फनकार
बेघर, अधपेट, अधनंगे हैं

दोस्ती, प्यार, प्राण से भी
आज पैसा सबसे अंगे है

द्वेष, अहंकार के चलते
हर सू होते फसाद-दंगे हैं

कैसे-कैसे न रहे कौड़ी के
ऐसे-वैसे हुए महंगे हैं

रोटी, लंगोटी, झोंपड़ी ने
खत्म कर दी सारी उमंगे हैं

धनवानों के श्वान सारे
दुम हिलाते बड़े चंगे हैं

मुसीबत खड़ीं होगी-अगर
नेता को कहेंगे बढंगे हैं

हवा चली तो है आसमान
वरना ख़ाक में पतंगे हैं

चारों तरफ हैं हादसे सैलाब की तरह।

चारों तरफ हैं हादसे सैलाब की तरह।
मुंह बाए मौत है खड़ी गिर्दाब की तरह

बारिश ने हमको अबके दिया है फरेब यू,
बरसा है हम पै अब्र भी तेज़ाब की तरह।

माना कि दुनिया एक शगुफ़्ता गुलाब है,
खु़शबू हमें मिली है मगर ख़्वाब की तरह।

क्यों कर समेटिए इन्हें कैसे सहेजिए,
बिखरी हुई हैं हसरतें सीमाब की तरह।

नज़दीक जाके देखिए वे पूरे गिद्ध हैं,
गो लग रहे हैं दूर से सुर्खाब की तरह।

जिसमें छिपे हैं अश्क औ, आहें भी, आग भी,
गोया हो आसमाँ दिले बेताब की तरह।

तकसीम हो रहा है लुटेरों में आदमी,
है जि़ंदगी भी लूट के असबाब की तरह।

इस दौर के इन्सान का लाजि़म है इम्तहाँ,
दुश्मन भी आज मिलते हैं अहबाब की तरह।