Monday, January 16, 2012

चारों तरफ हैं हादसे सैलाब की तरह।

चारों तरफ हैं हादसे सैलाब की तरह।
मुंह बाए मौत है खड़ी गिर्दाब की तरह

बारिश ने हमको अबके दिया है फरेब यू,
बरसा है हम पै अब्र भी तेज़ाब की तरह।

माना कि दुनिया एक शगुफ़्ता गुलाब है,
खु़शबू हमें मिली है मगर ख़्वाब की तरह।

क्यों कर समेटिए इन्हें कैसे सहेजिए,
बिखरी हुई हैं हसरतें सीमाब की तरह।

नज़दीक जाके देखिए वे पूरे गिद्ध हैं,
गो लग रहे हैं दूर से सुर्खाब की तरह।

जिसमें छिपे हैं अश्क औ, आहें भी, आग भी,
गोया हो आसमाँ दिले बेताब की तरह।

तकसीम हो रहा है लुटेरों में आदमी,
है जि़ंदगी भी लूट के असबाब की तरह।

इस दौर के इन्सान का लाजि़म है इम्तहाँ,
दुश्मन भी आज मिलते हैं अहबाब की तरह।

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