होते हैं प्यार के अनेक रूप
तुम पढ़ती हो मेरी कविता
इसी वजह से
मैं रहता हूँ अब खुश
तुम ही वह शीतल प्रतिछाया हो
... जिसे ओढ़ मैं जीता
चाहे कितनी भी हो कड़ी धूप
तुम्हारे मन कों ही पढ़ता हूँ
तुम्हारे सौन्दर्य पर ही लिखता हूँ
तुम्हें मुझसे न प्रेम हैं न नफरत
मेरे प्रति तटस्थ पारदर्शी इस भावाना से
मैं हूँ अभिभूत
सौप दिया हैं स्वयं कों
तुमने मुझे
कल्पनाओं में चित्रित करने की
देकर छूट
भरसक कोशिश करता हूँ
काव्य सृजन हो
तुम्हारी मनमोहक
छवियों के अनुरूप
तुम मेरी कल्पना से भी ज्यादा सुंदर हो
आलोकित कर जाता हैं मुझे
तुम्हारी रूह का नूर
तुम स्नेह की लहर हो
कभी पास आती हो
और
कभी चली जाती हो मुझसे दूर
तुममे साकार ,निराकार
दोनों आकार समाये
मुक्त होकर आकाश में बादलों सा
बिखर कर
हो गयी हो तुम उन्मुक्त
कही ऐसा न हो की
मेरे द्वारा सम्पूर्णत: अनउल्लेखित
रह जाए तुम्हारे व्यक्तित्व का
यह व्यापक स्वरूप
तुम पढ़ती हो मेरी कविता
इसी वजह से
मैं रहता हूँ अब खुश
तुम ही वह शीतल प्रतिछाया हो
... जिसे ओढ़ मैं जीता
चाहे कितनी भी हो कड़ी धूप
तुम्हारे मन कों ही पढ़ता हूँ
तुम्हारे सौन्दर्य पर ही लिखता हूँ
तुम्हें मुझसे न प्रेम हैं न नफरत
मेरे प्रति तटस्थ पारदर्शी इस भावाना से
मैं हूँ अभिभूत
सौप दिया हैं स्वयं कों
तुमने मुझे
कल्पनाओं में चित्रित करने की
देकर छूट
भरसक कोशिश करता हूँ
काव्य सृजन हो
तुम्हारी मनमोहक
छवियों के अनुरूप
तुम मेरी कल्पना से भी ज्यादा सुंदर हो
आलोकित कर जाता हैं मुझे
तुम्हारी रूह का नूर
तुम स्नेह की लहर हो
कभी पास आती हो
और
कभी चली जाती हो मुझसे दूर
तुममे साकार ,निराकार
दोनों आकार समाये
मुक्त होकर आकाश में बादलों सा
बिखर कर
हो गयी हो तुम उन्मुक्त
कही ऐसा न हो की
मेरे द्वारा सम्पूर्णत: अनउल्लेखित
रह जाए तुम्हारे व्यक्तित्व का
यह व्यापक स्वरूप
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